बिहार के मीडिया का एक चेहरा देखें और समझें
17 July 2010 5 Comments
♦ संजय कुमार
किसका मीडिया, कैसा मीडिया। जवाब सीधा है, पूंजीपतियों का मीडिया। सामंतों का मीडिया। दलालों का मीडिया। समरथ को नहीं दोष गोषाईं… आदि-आदि का मीडिया। जी हां, मीडिया की परिभाषा आज बदल चुकी है। मीडिया यानी खबरों, विचारों और मनोरंजन को लोगों तक पहुंचाना अब गाली लगती है। खबरें, साबुन, सर्फ, पेस्ट की तरह इस्तेमाल होने लगी हैं। सवाल है कि इस्तेमाल आखिर कौन कर रहा है। पत्रकार या मालिक। जाहिर है लाखों-करोड़ों पैसा लगाने वाला मीडिया हाउस का मालिक। फिर मीडिया किसका मीडिया हुआ? खबर खबर नहीं, विचार विचार नहीं, मनोरंजन मनोरंजन नहीं। वह बन जाता है उपभोक्ता वस्तु। फिर खबर हो या साबुन क्या फर्क पड़ता है, जब दोनों को बेचना ही है। खबरें भी ‘प्रोडक्ट’ की तरह बेची जा रही हैं। कहा जा सकता है कि बाजार तैयार हो चुका है। बल्कि मीडिया में बाजार घुस चुका है।
मीडिया के माध्यम से खबरों को बेचने का कारोबार फल-फूल रहा है। घटनाएं कई हैं, जो किसका मीडिया और कैसा मीडिया को नंगा करने के लिए काफी है। मीडिया के लिए उर्वर जमीन माने जाने वाले बिहार के मीडिया पर नजर डालते हैं। घटना है, बिहार की राजधानी पटना में राष्ट्रमंडल खेल के लिए देश भ्रमण पर निकले क्विंस बैटन रिले की। गत 14 जुलाई को क्विंस बैटन रिले पटना में आयोजित की गयी। ताम-झाम, धूम-धड़ाम के साथ रिले निकला। इसमें राजनेता, अधिकारी, हीरो-हिरोइन, खिलाड़ी, संस्कृतिकर्मी, पत्रकार, लेखक सहित आमजनों की भागीदारी रही। राजभवन से राज्यपाल ने बैटन को कला और संस्कृति विभाग के सचिव को सौंपा। उसके बाद बैटन रिले की यात्रा शहर के पैंतीस पड़ावों पर होते हुए श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल पर जाकर समाप्त हुआ। पैंतीस पड़ावों पर बैटन को लेकर आगे बढ़ने वालों में राजनेता से लेकर पदाधिकारी, हीरो होंडा के पदाधिकारी और बिहार के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई खिलाड़ी और एक अभिनेत्री शामिल थी। क्विंस बैटन रिले को कवर करने वालों में प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया का हुजूम भी पूरी तन्मयता से मौजूद रहा। बिहार के मीडिया ने क्विंस बैटन रिले के कवरेज को प्राथमिकता से जगह दी। मामला राष्ट्र हित का था और होना भी चाहिए था।
बिहार से प्रकाशित सभी अखबारों ने पहले पेज पर जगह दी। लेकिन बिहार के मीडिया का चेहरा एक बार फिर साफ हो गया कि आखिर उसकी सोच क्या है? यानी किसका मीडिया, कैसा मीडिया और किसके लिए? प्रश्न सामने आ ही गया। लोग भी चौंके। क्विंस बैटन रिले खबर तो बनी। अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू समाचार पत्रों ने क्विंस बैटन रिले की खबर तस्वीर मुख्यपृष्ठ पर तस्वीर के साथ प्रकाशित की। लेकिन बैटन के साथ कोई खिलाड़ी नजर नहीं आया। नजर आयी जानी-मानी फिल्म अभिनेत्री नीतू चंद्रा। राज्यपाल के साथ बैटन थामे नीतू की तस्वीर ने मीडिया की सोच को सामने ला दिया। वहीं एक अंग्रेजी और उर्दू के अखबार ने राज्यपाल को फोटो से हटाकर नीतू चंद्रा को क्विंस बैटन के साथ की तस्वीर को मुख्यपृष्ठ पर प्रकाशित किया। आश्चर्य की बात यह है कि रिले के दौरान क्विंस बैटन को थामने वालों में कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी मौजूद थे, लेकिन उनकी तस्वीर बैटन लिये हुए मुख्यपृष्ठ पर खबर नहीं बनी? एक बार फिर मीडिया ग्लैमर सेलिब्रेटरी के आगोश में समा गया। खेल प्रेमी हताश हुए, निराश हुए।
मीडिया के इस रवैये को लेकर खेल पत्रकारों और खेल प्रेमियों के पेट में गुदगुदी भी हुई। लेकिन गुदगुदी से उठी हंसी में मीडिया के रवैये के प्रति गुस्से का इजहार था, पीड़ा थी। मीडिया के अंदर और मीडिया के बाहर सवाल यहां उठता है किसका मीडिया? जी हां, जिसका मीडिया है, मालिक का – तो वह चीजों को अपनी तरह से ही लोगों के सामने परोसेगा ही? न कि जनता से पूछकर? स्वीटीः हाई प्रोफाइलः के पेट में दर्द होता है तो मीडिया खबर को उछाल-उछाल कर बवाल मचा देती है जबकि कजरी: गरीब-गुरबाः के पेट में दर्द होता है तो उसे नोटिस तक नहीं लिया जाता। मीडियाकर्मियों का मालिक कहता है कि उसे सुंदर चेहरे दिखाना है, सेलिब्रेटरी को दिखाना है। जो बिके, उसे खबर बनानी हैं। हो यही रहा है। मटुक-जूली की प्रेम कहानी, राखी-मीका की लड़ाई, अभिषेक व धोनी की शादी, कमिश्नर के कुत्ते, बिल्ली के छज्जे पर चढ़ जाने सहित कई खबरें हैं, जिन्हें मीडिया ने जमकर बेचा। वही जनहित की खबरें आयीं भी तो महज दिखावे के लिए।
सवाल मीडिया के भरोसे का
Posted by संजय कुमार on July 3, 2010 in मीडिया-संसार | 1 Comment
अक्सर हादसों दुर्घटनाओं के आंकड़े मीडिया में गलत आते रहते हैं। हालांकि अखबारों की मजबूरी होती है कि वे खबर को अपने सभी डाक संस्करण में समेटे और जल्दी में या यों कहें कि पहले खबर देने की आपाधापी के बीच प्रथमदृष्टा में जो भी सूचना मिली उसे खबर बना कर छाप दिया जाता है। हालांकि उस खबर के फालोअप पर ध्यान नहीं जाता है। नतीजन खबर के आंकडें में विरोधाभास अलग अलग समाचार पत्रों में साफ दिखने लगता है। वैसे में खबर की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है और सवाल उठने लगता है मीडिया के भरोसे का। मीडिया के टूटते भरोसे के पीछे बाजारवाद सबसे बड़ा कारण लगता है। साथ ही खबर को लेकर अखबार का गंभीर न होना भी एक कारण है। बाजार का मीडिया पर बढ़ता दबाव इतना ज्यादा हावी है कि इसने मीडिया के संवेदना को भी प्रभावित कर रखा है। खबर क्या है उस पर काम नहीं होता। बस खबर को जारी कर देना है। उसकी पुष्टि करने की जहमत आज के पत्रकार नहीं उठाते। ऐसे में गलत खबरों का प्रकाशन एवं प्रसारण होना आम बात है और खबर के प्रसारण प्रकाशन के बाद खबर के अपुष्ट होने पर खण्डन का छपना इस बात को दर्शाता है कि मीडिया खबर के मामले में गंभीर नहीं है
अक्सर हादसों दुर्घटनाओं के आंकड़े मीडिया में गलत आते रहते हैं। हालांकि अखबारों की मजबूरी होती है कि वे खबर को अपने सभी डाक संस्करण में समेटे और जल्दी में या यों कहें कि पहले खबर देने की आपाधापी के बीच प्रथमदृष्टा में जो भी सूचना मिली उसे खबर बना कर छाप दिया जाता है। हालांकि उस खबर के फालोअप पर ध्यान नहीं जाता है। नतीजन खबर के आंकडें में विरोधाभास अलग अलग समाचार पत्रों में साफ दिखने लगता है। वैसे में खबर की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है और सवाल उठने लगता है मीडिया के भरोसे का। मीडिया के टूटते भरोसे के पीछे बाजारवाद सबसे बड़ा कारण लगता है। साथ ही खबर को लेकर अखबार का गंभीर न होना भी एक कारण है। बाजार का मीडिया पर बढ़ता दबाव इतना ज्यादा हावी है कि इसने मीडिया के संवेदना को भी प्रभावित कर रखा है। खबर क्या है उस पर काम नहीं होता। बस खबर को जारी कर देना है। उसकी पुष्टि करने की जहमत आज के पत्रकार नहीं उठाते। ऐसे में गलत खबरों का प्रकाशन एवं प्रसारण होना आम बात है और खबर के प्रसारण प्रकाशन के बाद खबर के अपुष्ट होने पर खण्डन का छपना इस बात को दर्शाता है कि मीडिया खबर के मामले में गंभीर नहीं है
दलित सवालों को दबाती मीडिया
Posted by संजय कुमार on May 15, 2010 in चौथा खंभा, मीडिया-संसार | 1 Comment
आरोप है कि दलित सवालों को मीडिया ने लगभग दरकिनार सा कर दिया है। सवाल दलित मुद्दों का हो या फिर साहित्य या फिर कोई अन्य मुद्दा। इसे लेकर दलित बुद्धिजीवियों के बीच सवाल उठने लगे है कि दलित सवालों को उचित प्रतिनिधित्व मीडिया में नहीं मिल रहा है या नहीं। केवल दलित उत्पीड़न और बलात्कार को स्थान मिल रहा है। लेकिन वैचारिक सोच को दरकिनार करने की साजिश हो रही है। दलित विमर्श पर फोकस को लेकर अब कोई मीडिया पक्षधर नहीं दिखता है।
सीधी सी बात है उपभोक्तावादी संस्कृति में मीडिया का स्वरूप व्यापक हो चुका है। पत्रकारिता ‘‘मिशन है’’ शब्द का जमाना लद चुका है। साथ ही आज पत्रकारिता बाजारवाद की गिरफ्त में आकर एक खास वस्तु के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है। खबर को मसालेदार बनाकर बेचने का सिलसिला जारी है। बाजारवाद से आम, खास होते मीडिया की मोह-माया से ‘‘कुछ’’ भी नहीं बच पाया है। हर खबर को ‘‘वस्तु’’ बना कर परोसने करने की होड़ के सामने दलित विमर्ष ही क्या मानवीय पहलू भी दूर हो चुके हैं।
जहां तक मीडिया में दलित मुद्दों को उचित प्रतिनिधित्व देने की बात है तो प्रश्न बाजारवाद का ही सामने आता है। जो दलित विचार से जुड़े हैं वही अलग से दलित विमर्श के नाम पर पत्र-पत्रिकाएं निकालकर दलित साहित्य, विमर्श आदि को जगह दे रहे हैं।
दलित साहित्यकार डा० पूरण सिंह मानते हैं कि मीडिया में दलित सवालों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना तो दूर उन्हें गिना तक नहीं जाता। मीडिया जिसे देश के विकास में चैथा स्तम्भ कहा जाता है उसके मालिक सवर्ण मानसिकता के लोग यह बिल्कुल स्वीकार नहीं करेंगे, जिन्होंने इस समाज का सदियों से शोषण, अपमान, तिरस्कार किया हो, उन्हें प्रतिनिधित्व दिया जाये ? मैं तो यह कहूँगा कि मीडिया चाहे तो दलितों के यथार्थ को जनसामान्य तक पहुंचाने में सर्वोच्च भूमिका निभा सकती है। मीडिया के शीर्ष पर बैठे ये लोग जिस दिन मित्रता, शक्ति, विश्वमैत्री, पे्रम एवम् बन्धुत्व की भाषा बोलना सीख लेंगे उस दिन यह सवाल अप्रासंगिक हो जायेगा।
ज्यादातर दलित साहित्यकारों का मानना है कि देश की मीडिया राजनीति, अपराध, हीरो हीरोइन, सांप-बिल्ली-कुत्ते, अंधविश्वास आदि खबरों से पटे रहते हैं। अखबरों के रविवारीय व संपादकीय पृष्ठों में भी दलित सवालों और रचनाओं को कोई स्थान नहीं मिल रहा। विचार व साहित्य के नाम पर सवर्णों के साक्षात्कार, कहानियां, कविताएं ही आती हैं। और तो और रविवारी, परिशिष्टों में मीडिया ज्योतिष, वास्तुशास्त्र आदि की चर्चाओं से लबरेज रहती है। डा० .भीम राव अम्बेडकर, ज्योति बा फूले जैसे दलित विचारकों के विचार तो नहीं के बराबर आते हैं। अब तो अन्य महान व्यक्तियों को भी मीडिया तरजीह नहीं देती है। मीडिया के आकलन से साफ होता है कि इसने वैचारिक मुद्दों से मुंह मोड़ लिया है।
चर्चित दलित पत्रकार-साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय मानते है कि भारत की सवर्ण मीडिया आरम्भ से ही बेईमान और दोगले चरित्र की रही है। उसकी कथनी और करनी में अंतर है। सच तो यह है कि पिछले एक दशक से वे दलित सवालों को अपने हित के लिए उछालने में लगे हैं। ऐसा करते हुए वे दलित सवालों को प्रतिनिधित्व नहीं दे रहे हैं, बल्कि दलितों को राजनीतिज्ञों की तरह रिझाते हैं। वह मार्केट तलाश करते रहे हैं, जो उन्हें मिल भी रहा है। दलितों पर लिखते हुए उनका व्यापार खूब फल-फूल रहा है। दलित समाज के बुद्धिजीवियों को कम-से-कम यह समझना चाहिए। उन्हें अपने स्वतन्त्र मीडिया की स्थापना कर उसका विकास करना चाहिए।
वहीं कवि-पत्रकार कैलाश दहिया कहते हैं मीडिया दलित अत्याचारों को तो उठा रहा है, लेकिन दलितों का जो दृष्टिकोण है उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। दलित चाहता क्या है उस पर मीडिया बात नहीं करता। केवल आरक्षण के सवाल पर मीडिया को कोसने का काम करता रहता है। आरक्षण को सामाजिक स्तर पर नहीं देखता है बल्कि उसे आर्थिक आधार को ही सामने लाता है। दलितों के राजनीतिक सवाल को नहीं उठाता, बल्कि दलित नेतृत्व की बुराई ही करता रहता है। दलित राजनीति के सकारात्मक बातों को मीडिया निगल जाता है। कबीर व तुलसी के बीच में जो भेद है उसे मुद्दा नहीं बनाता। कबीर दलितों के सदगुरू है । जबकि तुलसी वर्ण व्यवस्था के पोषक। कहने का तात्पर्य यह है कि पूरी व्यवस्था ही सवर्णो के हाथ में है। ऐसे में मीडिया में दलितों और उनसे संबंधित मुद्दों की उपेक्षा कोई आश्चर्य की बात नहीं। वैसे मीडिया में दलित सवाल नहीं उठ रहे हंै तो इसे कोसने की जरूरत नहीं है। क्योंकि मीडिया जो है वह सवर्णांे का है। अगर दलित मुद्दों को उठाने की बात है तो इसके लिए मानसिकता बदलने की जरूरत है। वैसे यह कहना जल्दबाजी होगी कि दलितों के लिए कोई अलग मीडिया बनायी जाए। हाँ , किसी भी मीडिया में दलितों का प्रतिनिधित्व साफ-साफ दिखाई देना चाहिए। जहां तक योग्यता की बात है तो यह कुतर्क के सिवाय कुछ नहीं है। जब अमेरिका में डायवर्सिटी का सिद्धांत लागू हो सकता है तो हमारे यहां क्यों नहीं? अंतर्मन में झांकने की जरूरत है। बस औपचारिकता पूरी करने के लिए दलित पर होते अत्याचारों को मीडिया में जगह दी जाती रही है वह भी मात्र व्यवसायिक नजरिये के तहत।
सच है, मीडिया पर एक सरसरी नजर डाली जाये या फिर हाल में मीडिया पर हुए शोध पर नजर टिकायी जाये तो साफ पता चलता है कि कब्जा सवर्णो का है। ऐसे मे न्याय की बात बेमानी लग सकती है, बल्कि आरक्षण या फिर दलित-पिछड़ो के मामले में मीडिया के दोगले चरित्र से लोग वाकिफ हो चुके है। ऐसे में मीडिया में दलित मुद्दों का केवल और केवल खबर ही बनता है। वहीं देखा जा सकता है कि दलितों पर अत्याचार से जुड़ी खबरों को जरूर स्थान दिया जा रहा है।
वहीं देश भर के जाने माने दलित चिंतक/लेखक-पत्रकारों ने मीडिया में दलित सवालों के उचित प्रतिनिधित्व पर नहीं होने पर नाखुश है। माताप्रसाद कहते है कि ‘‘प्रिन्ट मीडिया में दलित उत्पीड़न और बलात्कार को स्थान मिल रहा है यही स्थिति इलेक्ट्रानिक मीडिया की भी है, किन्तु दलित साहित्य को इनसे प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है ’’। वहीं जसवंत सिंह जनमेजय कहते हैं ‘‘कुछ समय पहले जैन टी.वी. दलित विमर्श पर फोकस दिखाती थी, अब कोई मीडिया पक्षधर नहीं है ’’। भरत सिंह बेचैन का मानना है कि ‘‘ मीडिया में भी दलित सवालों और दलित साहित्य को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता। मीडिया वाले तो दलित सवालों से और ज्यादा मुंह चुराते हैं, लेकिन मीडिया की यह मनमानी ज्यादा दिन तक चलने वाली नहीं है दलित अब अपने अधिकारों के लिए सजग व आक्रामक होने लगे हैं ’’। जबकि जयप्रकाश वाल्मीकि कहते है ‘‘ राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर के समाचार-पत्र राजनीति, अपराध समाचारों, आदि से भरे रहते हैं। रविवारीय पृष्ठों में भी दलित सवालों और रचनाओं को कोई स्थान नहीं मिल रहा। साहित्य के नाम पर सवर्णों के साक्षात्कार, कहानियां, कविताएं ही आती हैं। इनके रविवारी, परिशिष्टों में बहुत से स्थानों पर ज्योतिष, वास्तुशास्त्र तथा स्वास्थ्य चचाएं ही होती है। महिला विमर्श भी न के बराबर हैं और जो दिया जाता है उसमें सौन्दर्य-निखार तथा रसोई के एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट व्यंजन बनाने की विधियां देकर ही महिला-विमर्श की पूर्ति की जा रही है। कुल मिलाकर मीडिया में नारी और दलित विमर्श गायब हैं। वहीं डी.डी. राउत मानव कहते हैं‘‘ मीडिया में दलितों पर अत्याचार से जुड़ी खबरों को जरूर स्थान दिया जा रहा है लेकिन उनका फोलो-अप कभी नहीं किया जाता जो आवश्यक होना चाहिए ’’। गणेश रायबोले कहते है ‘‘मीडिया भी बाजार का ही एक अंग है और बाजार पैसा नाम के मिथ को एक पवित्र सत्य की तरह पेश करता है जहां एक बात जरा हटकर कहने की विनम्र इजाजत चाहता हूं ‘पैसा झूठ, हिंसा, अहंकार और सत्ता में पर्यायवाची शब्द है। हालांकि शब्दकोष ऐसा नहीं कहता। पैसा कोई धनात्मक शक्ति नहीं इसलिए इसका सृजन, रक्षण या पालन से कोई संबंध नहीं है। पैसे का संबंध भक्षण से है। दरअसल जीवन के साधनों से दूसरों को (इनमें पेड-पौधे, पशु-पक्षी बगैरह भी शामिल हो सकते हैं) वंचित करके कमजोर करना और इन वंचितों की कमजोरी को स्वयं के शक्तिशाली होने के प्रमाण के रूप में पेश कर सकना ही पैसा है। पहले इसको पहचानना मुश्किल था लेकिन यदि आज संचेत रूप से पर्यायवरण एवं प्रदूषण इसकी वजह से संकट में पड़ी धरती के कारणों को खोजेंगे तो पैसे के राज का पर्दाफाश को जायेगा और आप देखेंगे जिस शक्ति को पैसा कहा जा रहा है कही से भी धनात्मक नहीं है। वह विशुद्ध शत्रुत्व है। मीडिया चूंकि बाजार का ही एक अंग है इसलिए पैसा ही उसका लक्ष्य है। बाकी सब चीजें साधन मात्र हैं। ऐसे में उचित-अनुचित के आधार पर मीडिया में दलित साहित्य के प्रतिनिधित्व की बात बेमानी है। हां, मीडिया दलित साहित्य को कुछ स्पेस दे रहा है, क्योंकि वह उसकी मार्किट वेल्यू को पहचान रहा है ’’। श्रीमती देवी नागरानी मानती है कि ‘‘ अभिव्यक्ति की आजादी है इस आजाद देश में, जहां पर एक मुक्त समाज में, प्रेस का कर्तव्य है बिहना किसी भय, प्रभाव के लोगों को जानकारी देना। अब कौन अपना दायित्व पूरी निष्ठा के साथ निभाता है इसका कोई मापदंड तो नहीं है, हां अगर ऐसा ईमानदारी से किया जाये तो फिर मसअले कम होते जायंेगे और उनके बार-बार उठाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। पर प्रेस पर भी कई अंकुश होते होंगे। यही मानकर जो छापा जा रहा है उसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी भी एक मुद्दे को लेकर हम उसके विकास की ओर जाती दिशा में कितना आगे बढ़ रहे हैं ’’। मूलचंद सोनकर इसे खरिज करते हुए कहते है कि बिल्कुल नहीं। मीडिया दलित संबंधी किसी भी सवाल को कोई अहमियत नहीं देता। उल्टे रवैया हमेशा नकारात्मक रहता है’’। तेजपाल सिंह तेज इसे स्वीकारते है उनका मानना है कि मीडिया सरकारी हो या निजी पूरी तरह व्यावसायिक हो गया है उसे कल्याणकारी कार्यों से कोई लेना-देना नहीं रह गया है। मीडिया द्वारा दलित सवालों को उचित तो क्या, स्थान तक न दिये जाने के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। मीडिया एक व्यावसायिक संस्था बनकर रह गयी है। उत्तरप्रदेश के पिछले चुनावों में मीडिया के अनुमान का हश्र हम देख चुके हैं। उसे दलित तो क्या आम जनता की समस्याओं से भी कोई सरोकार नहीं है। कर्मशील भारती मीडिया को निजी हाथों का खिलौना मानते है। रवि शंकर कहते है‘‘ ऐसा प्रतीत होता है कि न तो मीडिया ने ही दलित समस्याओं को उजागर करने में अधिक रूचि दिखाई और न ही दलित साहित्यकारों ने मीडिया का लाभ उठाने में अधिक रूचि दिखायी। दलित साहित्य आमतौर पर दलित समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं तक सिमटा पड़ा है। यही कारण है कि मीडिया में दलित सवालों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।
हालांकि कई दलित साहित्यकार-पत्रकार मानते हैं कि इन सब के पीछे बाजारवाद महत्वपूर्ण है। मीडिया चूंकि बाजार का ही एक अंग है इसलिए पैसा ही उसका लक्ष्य है। ऐसे में उचित-अनुचित के आधार पर मीडिया में दलित सवालों के प्रतिनिधित्व की बात बेमानी लगती है। इधर तेजी से यह बात उठने लगी है कि दलितों को अपनी बात आम-खास जनता तक पहुंचाने के लिए एक अदद मीडिया की अलग से जरूरत है। अगर ऐसा होता है तो इस दिशा में एक सकारात्मक पहलू होगा, क्योंकि मीडिया के चरित्र से हर कोई वाकिफ है। कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।
खबर छापने के बदले अखबार खरीदने पर दवाब
Posted by संजय कुमार on April 21, 2010 in मीडिया-संसार | 0 Comment
प्रख्यात पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी ने भारतीय मीडिया द्वारा चुनाव के दौरान पैसे लेकर खबर छापने की परिपाटी के खिलाफ जो मुहिम छेड़ी थी, उसकी गुंज संसद और चुनाव आयोग में सुनाई दी है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान देशभर में ये गुंज सुनाई दी थी। अब संसद में भी इसकी गुंज सुनाई पड़ी है। राज्यसभा में सांसदों ने पैसे लेकर मीडिया द्वारा खबर छापने की खतरनाक बढ़ती प्रवृति के खिलाफ गंभीर चर्चा की। यही नहीं सरकार से अनुरोध भी किया गया कि लोकतंत्र के हित में इस पर अंकुश लगाया जाये। सांसदों ने मीडिया द्वारा पैसे लेकर खबर छापने को लोकतंत्र के लिए घातक बताया। जबकि स्व. प्रभाष जोशी ने देश भर में मुहिम चलाकर इसे पत्रकारिता के लिए खतरनाक सोच करा दिया था। हालांकि उस समय राजनीति से जुड़े लोगों ने कोई कोहराम नहीं मचाया था। और न ही स्व. जोशी के साथ खड़े हुए। कुछ अखबार व पत्रकारों ने भले ही उनके साथ कंधा से कंधा मिलाया। लम्बे समय के बाद सत्ता के गलियारे में पहुंचने वाले गोलबंद हुए, अच्छी बात है लेकिन अनका दबाव कितना असरदार होगा यह तो आने वाले चुनाव के दौरान ही पता चल पायेगा।
पैसे लेकर खबर छापने की प्रवृति में प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया दोनों शामिल है। पैसे लेकर खबर छापने की मीडिया के सोच के खिलाफ केवल सांसद ही नहीं बल्कि पिछले ही दिनों मुख्य निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला ने भी चिंता व्यक्त की और इसे गलत करार भी दिया। भोपाल में नेशनल इलेक्शन वाॅच यानी राष्ट्रीय चुनाव निगरानी नामक स्वैच्छिक संगठन की ओर से आयोजित छठे राष्ट्रीय सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए श्री चावला ने पैसे लेकर खबर देने को सबसे गलत बताते हुए मीडिया से आग्रह किया कि इस बुराई को रोकने के लिए वे आत्म संयम अपनाये। श्री चावला ने कहा कि मीडिया को पैसे लेकर खबर देने की प्रवृति पर रोक लगाने के वास्ते स्वयं ही मानक तैयार करने होंगे। क्योंकि इससे लोकतंत्र को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है।
पैसे लेकर खबर छापने की प्रथा कोई नई नहीं है और इसपर हो-हल्ला तब मचा जब स्व. प्रभाष जोशी ने पूरे देश भर में मीडिया के इस सोच के प्रति जन आंदोलन चला दिया था। गत लोकसभा चुनाव और कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान यह खुलकर सामने आ गया था। मीडिया ने पैसे लेकर खुलेआम खबर छापने का सिलसिला जारी रखा। यह हो-हल्ला लोकतंत्र के निर्माण में, लोकतंत्र के ही एक खंभे द्वारा किया गया। इस मसले पर पत्रकार भी दो खेमें में नजर आये।
मीडिया ने अपने को बाजारवाद के चंगुल में डालकर संभवतः मीडिया को व्यवसायिक नजरिये से परोस दिया। हो-हल्ला तो चुनाव के दरम्यिान नेताओं द्वारा अपने फेवर में पैसे देकर खबर को प्रकाशन प्रसारण से हुआ। लेकिन गुपचुप तरीके से नये-नये हथकंडों के जरिए खबर छापने/प्रसारित करने का सिलसिला जारी है। इसमें दस टकिया पत्रकारों को मोहरा बनाया जा रहा है। यह चैंकाने वाला तथ्य है या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता लेकिन बिहार के कई जिलों में तैनात पत्रकारों से खबर छापने के बदले अखबारों की प्रतियां बिकवाई जाती है। इसमें बड़े मीडिया गु्रप शामिल हैं। बिहार के कई जिलों के अखबारों से जुड़े पत्रकारों ने बताया कि किसी भी कार्यक्रम या खबर को छापने के लिए संबंधित संस्था या व्यक्ति से पैसे न लेकर उससे खबर छापने के एवज में अखबार की प्रतियां खरीदने पर दवाब बनाया जाता है। अखबार द्वारा अपने संवाददाताओं पर विज्ञापन के लिए दबाव बनाने की बात पुरानी हो चुकी है लेकिन प्रतियां बिकवाने का नया फंडा निकाल लिया गया हैं।यानी खबर छपने के बदले अखबार की प्रतियां खरीदो ?
मीडिया में इस तरह की परिपाटी का जन्म लेना मीडिया के लिए भयावह है और जिस तरह की सोच मीडिया के अंदर बढ़ती जा रही है वह काफी खतरनाक है।
अश्लीलता का मायाजाल
Posted by संजय कुमार on April 7, 2010 in चौथा खंभा, मीडिया-संसार | 2 Comments
प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोषी ने आहत हो कर इलैक्ट्रोनिक मीडिया के सनसनी और अश्लीलता फैलाने के सवाल पर कहा था कि अगर तुम राखी का स्वयंवर दिखाओगे तो तुम्हें सुहागरात और प्रसव भी दिखाना पड़ेगा…। हुआ भी वही। रियलिटी शो वालो ने ‘पत्नी पति और वह’, ‘राहुल दुलहनियां ले जायेगा.’….को दिखा ही दिया। राहुल की शादी को लोगों ने टी.वी. पर देखा। प्रभाष जोषी की पीड़ा को विराम नहीं लग पाया है। टेलिविजन पर अश्लील कार्यक्रमों का दौर ठहरने का नाम ही नहीं ले रहा है। रियलिटी शो के नाम पर कार्यक्रम के अंदर अश्लीलता का मायाजाल कुलांचे मार रहा है। राखी का स्वयंवर, कोई मुझे जंगल से बचाओ, राहुल दुलहनियां ले जायेगा…..जैसे कई टेलिविजन कार्यक्रम एफ टी.वी. को पीछे छोड़ने की होड़ में लगे हैं।
इस होड़ पर अंकुश लगाने के मद्देनजर, अश्लीलता परोसने वाले कार्यक्रम दिखाने और सनसनी फैलाने वाली खबरें प्रसारित करने वाले करीब 44 चैनलों को पिछले तीन साल के दौरान सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने नोटिस जारी किये। प्रतिबंध और नोटिस के बावजूद टेलिविजन पर अश्लील कार्यक्रमों का दौर ठहरने का नाम नहीं ले रहा है। इन कार्यक्रमों के प्रसारण को लेकर सवाल उठते रहते हैं। ’राखी का स्वयंवर’ रियलिटी शो के प्रसारण पर भी सवाल उठे थे।
बात अश्लीलता की है। चैनल इसे फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। इसे लेकर समय समय पर सरकार नोटिस जारी करती रहती है। सरकारी नोटिस का असर हो ऐसा तो नहीं दिखता, बल्कि रियलिटी शो का तेवर जारी रहता है। घर-परिवार के बीच देखा जाने वाला टेलिविजन इस सवाल के घेरे में पहले ही आ चुका है कि अब यह परिवार के बीच बैठ कर देखने वाला नहीं रहा। रियलिटी शो के नाम पर टू पीस में ‘कोई मुझे जंगल से बचाओ’ में सेलिब्रिटी को खुले में और बिग बॉस में एक अभिनेत्री द्वारा स्वीमिंग पुल में टू पीस में नहाना, यही नहीं ’राखी का स्वयंवर और राहुल दुलहनियां ले जायेगा सहित कई अन्य रियलिटी शो में कई ऐसे दृष्य दिखाये गये जो अश्लीलता के दायरे में आते हैं। सरकारी कार्यवाही जिन पर हुई उन में सबसे ज्यादा रियलिटी शो ही आये। मसलन, ‘सरकार की दुनिया’ राज पिछले जन्म का, ‘इस जंगल से मुझे बचाओ’, ‘स्प्लिटविला-3’, ‘दादागिरी’, ‘इमोशनल अत्याचार’ आदि प्रमुख हैं। एमटीवी, एनडीटीवी इमेजिन, बिन्दास, कलर्स, सोनी, चैनल-वी, स्टार प्लस चैनलों को नोटिस जारी किये गये। वहीं कुछ क्षेत्रीय भाषाओं के चैनलों को भी नोटिस जारी किये गये।
ऐसा नहीं कि केवल रियलिटी शो दिखाने वाले चैनल ही अश्लीलता और सनसनी के आरोप में आये बल्कि डिस्कवरी और नेशनल ज्योग्राफिक जैसे चैनलों पर भी अश्लील विज्ञापन और भारत का गलत नक्शा दिखाने का आरोप लग चुका है। हाल ही में लोकसभा में एक तारांकित सवाल के जवाब में सूचना व प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने कहा कि इंडिया टीवी, स्टार न्यूज, जी न्यूज, आज तक, इंडिया न्यूज, न्यूज-24, आईबीएन-7, सहारा समय, हेडलाइंस टुडे, एनडीटीवी 24-7, सीएनएन-आईबीएन, टाइम्स नाउ, ईटीवी जैसे समाचार चैनलों को सनसनी वाले, अश्लील या निराधार समाचार देने के आरोप में मंत्रालय ने नोटिस भेजे।
सरकारी अंकुश के बावजूद समाज के प्रहरी, टी.आर.पी. के खेल में जुटे है। मामला केवल रियलिटी शो तक ही नहीं है। समाचारों पर भी अश्लीलता और सनसनी का आरोप लग चुका है जो एक गंभीर मामला बनता दिखता है। रियलिटी शो वाले कार्यक्रम को लोकप्रिय बनाने के लिए अश्लीलता परोसने की बात थोड़ी देर के लिए समझ में आ भी जाती है, लेकिन समाचार के कार्यक्रमों में इसे पिरोना अटपटा सा लगता है। जहां ऐसे कार्यक्रम पर अंकुश को लेकर सरकारी प्रयास हो रहे हैं वहीं मीडिया को सामने आना होगा और अपने दायित्व के प्रति सचेत होना होगा। ताकि जनता का विश्वास कायम रहे। हालांकि चारों तरफ हो रही आलोचना को देखते हुए कुछ समय पहले ही खबरिया चैनलों के संपादकों ने ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बी ई ए) नामक संगठन बनाया था, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ प्रसारित सामग्रियों की गुणवत्ता को भी सुनिश्चित करने के लिये काम करने वाला था। टीआरपी की होड में प्रसारित किये जाने वाले कार्यक्रमों एवं समाचारों के स्तर को यह कितना सुधार पाया है यह तो नजर आ रहा है !
’जनता देखना चाहती है और हम दिखाते हैं….’ जैसे फिल्मी बयान से भी मीडिया को परहेज करना होगा।
मीडिया में नियुक्ति का सच
Posted by संजय कुमार on March 12, 2010 in मीडिया-संसार | 3 Comments
देश दुनिया की खबरों को मीडिया अनोखे अंदाज में लोगों के सामने लाने की दिशा में रोजाना कुछ न कुछ नया करके रिझाने की फिराक में रहता है। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पहलूओं सहित हर आम खास पहलू को खबर बना कर लोगों के समक्ष पेश करने की होड़ मीडिया मे देखी जा सकती है।
मीडिया के लिए मिशन शब्द उसके डिक्षनरी से लगभग गायब हो चुका है। दूसरे की जिंदगी में ताक झांक कर खबर बनाना, इसकी फिदरत है। लेकिन इसके अंदर की खबर किसी को नहीं मिलती ? चर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं ने जब खबरिया चैनलों पर एक विशेषांक निकाला तो मीडिया जगत की कुछ अंदरूनी बातें सामने आयी। लोग चैंके। बहस हुई । पत्रकार अनिल चमड़िया और योगेंद्र यादव ने मीडिया के जाति प्रेम की जब पोल खोली तो, मीडिया के ठेकेदारों के बीच हड़कंप मची। वाद-विवाद का दौर चल पड़ा। हंस और कथादेश में छपे मीडिया के अंदर की बात पर सफाई दी जाने लगी, तो वहीं मीडिया पर उंची जाति के कब्जे की बात को खारिज करने का भी सिलसिला चला। जाहिर है मीडिया के अंदर के सच पर जब मीडिया के ही लोगों ने हमला बोला तो इसे तथाकथित मीडियाकर्मी पचा नहीं पाये। आज कुछ अखबार जहां मीडिया पर आलेख छाप रहे हैं वहीं बेव पत्रकारिता से जुड़े लगभग सभी अंतरजालों ने अपने यहां मीडया पर एक कॉलम ही चला दिया है जबकि कई अंतरजाल सिर्फ मीडिया तक ही सीमित है।
खैर, बात मीडिया के अंदर की है। मीडिया के अंदर कई सच है, जो सामने नहीं आते और आते भी हैं तो उसे जगह नहीं दी जाती। इधर, आर्थिक तंगी की मार से जहां पूरा विश्व परेशान है। हर जगह छटंनी/ संस्थान को बंद करने का सिलसिला सा चल पड़ा है। तो ऐसे में, मीडिया संस्थान भी इससे अछूते नहीं हैं। पत्रकारों को निकालने का दौर चल पड़ा है। अंतरजालों पर इन दिनों पत्रकारों के निकाले जाने और चैनल/ प्रकाशन के बंद होने से पत्रकारों के बेरोजगार की होने की खबरें लगातार मिल रही है। वहीं नये समाचार पत्रों के प्रकाशन की भी खबर है। जहाँ एक ओर पत्रकारों के निकाले जाने की खबर मिल रही है वहीं दूसरी ओर नये समाचार पत्रों के प्रकाशन की खबर भ्रम पैदा करती मिलती है। जनवरी 2009 में दैनिक हिन्दुस्तान ने अपना इलाहाबाद संस्करण शुरू किया अब गोरखपुर की तैयारी में हैं।
मीडिया हाउस के बंद होने और पत्रकारों के निकाले जाने की खबर किसी न किसी रूप में तो मिल जाती है। लेकिन मीडिया में एक बात है जो सामने नहीं आती। वह है नियुक्ति की। प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक इसके संपादक या फिर उपसंपादक/ संवाददाता या यो कहें कि मीडिया के अंदर किसी पद की नियुक्ति का पता ही नहीं चल पाता है। संपादक के पद के लिये तो विज्ञापन आता ही नहीं। अचानक पता चलता है कि फलाने अखबार के संपादक की जगह फलाने ने ले ली है। यहां तक मीडिया हाउस में कार्य कर रहे लोगों तक को पता नहीं चल पाता है और रातों रात संपादक बदल जाते हैं।
वहीं सरकारी क्षेत्र की नियुक्तियां कई प्रक्रिया से गुजरती है। नियुक्ति आदेशपाल का हो या फिर अधिकारी-कर्मचारी का। विज्ञापन प्रकाशन के बाद कई महीनों तक नियुक्ति की प्रक्रिया चलती है। लेकिन मीडिया हाउसों में ज्यादातर नियुक्तियां अंधेरे में हो जाती है। हालांकि, कुछ मीडिया हाउस नाम के लिए विज्ञापन प्रकाषित करते हैं। इनका प्रतिशत बहुत ही कम है। देखा जाये तो नियुक्ति के मामले में जितना पारदर्शिता सरकारी संस्थाएं बरतती हैं, उतना गौर सरकारी संस्थाएं नहीं।
मामला केवल नियुक्ति तक का ही नहीं है। बल्कि वेतन को लेकर भी पारदर्शिता नजर नहीं आती। संपादक या फिर उच्चे पदों पर गोपनीय नियुक्ति का मामला थोड़ी देर के लिये समझ में आता है लेकिन निचले स्तर पर यानी उपसंपादक/ संवाददाता या फिर प्रशिक्षु पत्रकार की गोपनीय नियुक्ति का मामला सवाल खड़े करते मिलते हैं। देश भर के विश्वविद्यालयों में आज पत्रकारिता की पढ़ाई होने लगी है। हर साल हजारों छात्र पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश में मीडिया हाउसों के चक्कर लगाते मिलते हैं। कई जुगाड़ व जातीय संस्कृति की वजह से नौकरी पाने में सफल हो जाते हैं। जिन्हें नहीं मिल पाता है उनमें मीडिया को लेकर एक गतिरोध उत्पन्न हो जाता है।
सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी वार्षिक समीक्षा रिर्पोट के अनुसार देश में 417 चैनल है जिनमे अपलिंक्ड चैनलों की संख्या 357 है। इनमें 197 न्यूज चैनल यानी खबरिया चैनल है और 160 गैर खबरिया चैनल यानी नॉन न्यूज एंड करंटअफेयर्स से संबधित चैनल हैं। जहां पत्रकारों की भारी संख्या में खपत होती है। इधर कई और नये चैनल खुले है। वहीं आरएनआई के अनुसार 31 मार्च 2006 तक पंजीकृत समाचार पत्रों की संख्या 62,483 थी। जाहिर सी बात है, जब देश भर के हर छोट-बडे़ शहरों में समाचार पत्र छप रहे हैं तो वे बिना पत्रकारों व संपादकों के नहीं। सच तो यह है कि एकाध समाचार पत्र ही नियुक्ति से संबंधित विज्ञापन विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशीत करते हैं। ज्यादातर मीडिया हाउसों में होने वाली नियुक्ति अंधेरे में ही हो जाती है। जिसका खामियाजा पत्रकारिता संस्थाओं से निकलने वाले छात्रों को भोगना पड़ता है। इस बात को पत्रकारिता संस्थाओं में पढ़ने वाले छात्र समझ चुके हैं और वे भी पढ़ाई पूरी करने के बाद मीडिया हाउस में नौकरी पाने के लिए जुगाड़ संस्कृति की ओर मुड़ रहे हैं। हालांकि मीडिया हाउस जुगाड़ और जातीय समीकरण को खारिज करते हैं और योग्यता की दुहाई देने से परहेज नहीं करते। पत्रकार अनिल चमड़िया और योगेन्द्र यादव के सर्वे ने मीडिया हाउसों में जातीय घुसपैठ की पोल पहले ही खोल दी है। जिससे बौखला कर कहा जाने लगा कि मीडिया की जाति नहीं योग्यता देखिये। सवाल उठता है कि पत्रकारिता संस्थाओं के छात्र जब पढ़ाई पूरी कर नौकरी के लिये निकलते हैं तो क्या उनके पास योग्यता नहीं होती ? बहरहाल, मीडिया को भी पारदर्शी होने की जरूरत है। खास कर पत्रकारों की नियुक्ति के मामले में। ताकि नई पौध को कुछ नया करने का अवसर मिल सके।
हाईप्रोफाइल कब्जे में मीडिया
Posted by संजय कुमार on February 26, 2010 in मीडिया-संसार | 2 Comments
मीडिया ने जेसिका लाल, प्रियदर्शनी मट्टू, नीतीश कटारा मामले में न्याय दिलाने में जबरदस्त भूमिका अदा की और अब रुचिका-राठौर मामले को जिस तरह से उजागर किया है वह प्रयास अपने आप में सराहनीय है। यकीनन न्याय दिलाने की दिशा में मीडिया का यह प्रयास काबिले तारिफ है। वर्षो बाद समाज के दबंग व्यक्ति पर कानूनी शिकंजा कसा। इसके लिए मीडिया की दबिश को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। हालांकि रुचिका को न्याय मिले इसके लिए मीडिया ने जो गोलबंदी की, वह नयी बात नहीं है। इससे पहले भी जेसिका लाल हत्या, आरुषि कांड या फिर संजीव नंदा का मामला ही क्यों न हो मीडिया ने परत दर परत को पूरी ताकत लगा कर खोला। दोषी कानून के घेरे में आये। लेकिन वहीं मीडिया का दूसरा पक्ष छूट जाने से, सवाल उठना लाजमी है।
सवाल है, समाज के अंदर लो प्रोफाइल के लोगों या फिर दबे कुचले लोगों की आवाज में आवाज में मिलाकर मीडिया उस ताकत से सामने नहीं आता, जितना कि रुचिका, आरुषि जैसे हाई प्रोफाइल के मामले में आता है। देश भर में ऐसे सैकड़ों लो प्रोफाइल से जुड़े लोगों के मामले पड़े है। न्याय की आस में पीड़ितों की आंखें पथरा गई है। पिछले ही दिनों बिहार के सीवान जिले में एक दलित को कई दिनों तक पेड़ से बांध कर रखा गया और उस पर जुल्म ढाहे गये। मीडिया में खबर तब आयी जब महादलित आयोग के एक सदस्य ने खबर की ओर मीडिया का ध्यान आकर्षित कराया। मीडिया में लो प्रोफाइल की खबरे आती जरूर हैं लेकिन वह फ्लैश की तरह, यानी कब आती और कब चली जाती है, लोगों को पता भी नहीं चलता। सामंती समाज में रुचिका की तरह कई रुचिका छेड़छाड़ की शिकार होती रहती है। बलात्कार के बाद हत्या या फिर जुल्म सितम का अमानवीय कहर। समाज के दबंग खुलेआम आतंक मचा रहे है। यहां, एक महत्वपूर्ण बात यह कि आज मीडिया चाहे वह प्रिंट हो या खबरिया चैनल उन पर जिस तरह से बाजार हावी है, उससे खबरों को परोसने का मापदंड भी बदल चुका है। एक दूसरे को पछाड़ने और टीआरपी के खेल में चैके छक्के लगाने वाला मीडिया हाई प्रोफाइल की गिरफ्त में है। अंतिम कतार में खडे किसी सुदूरवर्ती गांव में भूख, कालाजार और डायरिया जैसी बीमारियों से हो रही मौत, आज मीडिया के लिए खबर नहीं है। ज्यादातर खबरिया चैनल ऐसी खबरों से परहेज करते हैं। जवाब साफ है मरने वाले लोग लो-प्रोफाइल के जो हैं? कमिशनर साहब का कुत्ता गुम हो जाये या फिर बिल्ली छज्जे पर चढ़ जाये तो चैनलों के लिए ब्रेकिंग खबर बनती है। स्वाईन फ्लू की चपेट में मंत्री या संतरी आ जाये तो फिर देखिये खबर को दिखाने के मामले में मीडिया का कमाल, वहीं एक गरीब इसकी चपेट में आ जाये तो उसे ऐसे दिखायेगे मानो उन लोगों ने कोई अपराध किया हो। ऐसा ही कुछ पिछले दिनों बिहार में देखने को मिला था। स्वाईन फ्लू के संभावित पांच मजदूर जब बक्सर ट्रेन से बक्सर आये तो उन्हें मीडिया ने ऐसे दिखाया जैसे कोई बड़ा अपराध कर वे आये हो वहीं, स्वाईन फ्लू से पीड़ित एक बड़े अधिकारी की खबर तो आयी लेकिन वह सामने नहीं आये। हाई व लो प्रोफाइल की गिरफ्त में मीडिया का चेहरा देखने को मिलता है। खासकर दलित, पिछड़ा और दबे कुचले लोगों के साथ मीडिया का नजरिया एक तरफा है। कालू राम की बेटी कजरी के साथ गांव के दबंगों द्वारा छेड़छाड़ और विरोध करने पर मार पीट कर उन्हें गांव से भगा देने की खबर कई दिनों के बाद अखबार के अंदर के पेज में कोने में कहीं खबर बन जाती है। जबकि खबरिया चैनल नोटिस तक नहीं लेते। वहीं किसी हाई प्रोफाइल के साथ हो तो देखिए मीडिया की तत्परता। जाहिर है मीडिया को गंदी और तंग बस्तियों में रहने वाले दबे कुचले लोगों का विजुअल दिखाने होंगे। ऐसे में मीडिया की टी आर पी का मीटर डाउन हो जायेगा। क्योंकि मापदण्ड बन चुका है कि यदि टी आर पी बेहतर लेनी है तो स्क्रीन पर हाई प्रोफाइल लोगों को दिखाओ। पोस कलोनी का कोई बच्चा बीमार हो जाये तो खबर टी.वी. चैनलों के लिए बड़ी खबर बन जाती है भले ही किसी सुदूर गांव या फिर मलीन बस्ती में कोई गरीब का बच्चा डायरिया से मर रहा हो तो वह खबर दब जाती है। हाई प्रोफाइल स्कूल में बच्चे के साथ कोई घटना घट जाये तो उसके पैरेंटस की चीखों से टी.वी. स्क्रीन हिल जाता है। बच्चों की खूबसूरत मम्मियों की रोते हुए बाइट लेने के लिए रिपोटर्स की भीड़ लग जाती है। वहीं लो प्रोफाइल के स्कूलों के बच्चों के साथ कुछ हो जाये या कभी कभार टीवी चैनलों पर मध्याह्नन् भोजन खाने से बीमार पड़े बच्चों की खबरें दिखती भी हैं तो उसके लिए खाने में छिपकिली या कीड़े-मकोड़े का गिरना जरूरी है। उन गरीब बच्चों की मम्मियों को रोते हुए या फिर अस्पताल पहुंचते बच्चों को नहीं दिखाया जाता है। पूरा मामला हाई लो पर अटक जाता है। टीआरपी खेल के महारथी मानते है कि टी.वी. स्क्रीन पर हाई प्रोफाइल लोगों को दिखाओ, तो बाजार बनेगा। धूल धूसरित, नाक से बहता पानी, चेहरे पर मखियों की भन भनाहट से लथपथ चेहरों को दिखाने से टीवी स्क्रीन शायद मलीन हो जाये ? सच तो यह है कि बाजारवाद है इसके पीछे। हाई प्रोफाइल के लोग देश-समाज की नीति व रणनीति तय करते हैं ? गरीब गुरबा तो सिर्फ अपने मत का प्रयोग ? बाजार-विचार उनसे नहीं चलता। अब बाबा साहेब डा. भीम राव अम्बेदकर को ही लें, कितने टीवी चैनल उनके विचार को प्रचारित करते हैं ? जबकि दूसरे बाबाओं से चैनल वाले पटे रहते है। जाहिर है बाबा साहेब के विचार में बाजार नहीं है जबकि अन्य दूसरे बाबाओं के विचार में बाजार ही सोच है। कुल मिला कर बाजारवाद ही सामने आता है ऐसे में मीडिया को उपर उठ कर सोचना होगा और समाज को एक ही आईने से देखना होगा।
सेक्स / यौन सर्वेक्षण के बहाने
Posted by संजय कुमार on February 18, 2010 in चौथा खंभा | 6 Comments
बाजारवाद के आगे आज सब कुछ गौण हो चुका है। आमखास इसकी गिरफ्त में हैं। मीडिया भी इससे अछूता नहीं। अपने को बाजार में बनाए रखने के लिए मीडिया बाजारवाद के झंडातले खड़ा हो कर हां में हां मिलाता मिलता है। भले ही इसके लिए उसे मापदण्ड, नीति व सिद्धांत को ताक पर ही क्यों न रखना पड़ा हो! बल्कि रख चुका है। बाजार में बने रहने के लिए आज मीडिया किसी हथकंडे को अपनाने से बाज नहीं आ रहा है। यह चिंता का विषय है। प्रिंट हो या इलैक्ट्रोनिक बाजारवाद के झंझावात में फंस कर अपने मूल्यों को तहस नहस करने में लगा हैं। और यह बार बार हो रहा है। हाल ही में राष्ट्रीय स्तर के हिन्दी व अंगे्रजी भाषा की दो पत्रिकाओं (इंडिया टुडे और आउटलुक) ने सेक्स व यौन सर्वेक्षण के नाम पर जो कुछ परोसा वह चर्चे में है। चर्चा है, सर्वेक्षण के बहाने अश्लील तस्वीरें छापने और एक दूसरे को पीछे छोड़ने की आपाधापी में पत्रकारिता के मूल्यों को शर्मषार करने का। सेक्स व यौन सर्वेक्षण के बहाने नग्न व अर्द्धनग्न तस्वीरों को बड़े ही सहज ढंग से परोस गया है। सर्वेक्षण तो पाठकों के लिए कौतूहल का विषय है लेकिन तस्वीरों के पीछे मकसद साफ झलकता है। वह भी कवर पेज पर देकर पाठकों को लुभाने की दिशा में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है।
सेटेलाइट टीवी के क्रांतिकारी हस्तक्षेप से टीवी पत्रकारिता की दशा व दिशा दोनों ही बदल गई है। परिवार के साथ टीवी देखने की बात पुरानी एवं बेमानी हो चुकी है (दूरदर्शन को छोड़ कर)। वजह साफ है सेटेलाइट चैनलों की टीआरपी का खेल। कार्यक्रम हो या खबर, सेक्स, अश्लीलता, हिंसा, अपराध आदि को परोसना, नियति बनती जा रही है। गिनाने के लिए कई उदाहरण पड़े है। इस मामले में प्रिंट ने सेटेलाइट चैनलों को भी पीछे छोड़ दिया है। ड्रांइग रूम में कभी अतिथियों को आर्कषित करने के मद्देनजर टेबल पर रखी जाने वाली पत्रिकाएं बेड रूम की शोभा बढ़ाने लगी है। बच्चे या जवान बेटे बेटियों की नजर से पत्रिका को हटाया जाने लगा है। सेक्स या यौन विषय पर चर्चा करने के मुद्दे को खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन इसके बहाने पोर्नाग्राफी को बढ़ावा देना कहां तक उचित है ? सेक्स या यौन की चर्चा बेसक होनी चाहिये लेकिन क्या नग्न या फिर सेक्स करते हुए तस्वीरे छाप कर कौन सी शिक्षा देने की कोशिश की जा रही है ? क्या बिना तस्वीरों की बात बन सकती थी ? देना ही था तो रेखांकन चित्र से भी काम चल सकता था। यही काम अगर मीडिया के अलावे कोई संस्था या फिर किसी पार्लर या किसी आयोजन में होता हो मीडिया उसकी खिचांई करने से बाज नहीं आता ! मीडिया द्वारा सेक्स व यौन सर्वेक्षण के बहाने नग्न व अर्द्धनग्न तस्वीरें छापना इस बात का द्योतक है कि इसके पीछे बाजार है और बाजार के लिए सेक्स बिकाउ है।
पे्रस नियमों की मीडिया द्वारा धज्जी उड़ाने का सिलसिला जारी है। बिना तस्वीर के काम चलने के बावजूद नियमों को ताख पर रख कर तस्वीरें छापी जा रही है। महिलाओं के चेहरे को छुपाया भी नहीं जाता। कई उदाहरण पड़े हैं जब मीडिया ने मापदण्डों को ताख पर रख, बस अपने को बाजार में बनाये रखने के लिए एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में महिलाओं की अर्द्धनग्न तस्वीर छाप दी। पटना की सड़क पर एक महिला को अर्द्धनग्न करने की खबर बासी नहीं पड़ी है। मीडिया ने उस महिला की अर्द्धनग्न तस्वीर ही नहीं छापी बल्कि उसका सही नाम भी छाप कर अपनी पीठ खुद थपथपा ली ! सवाल उठता है कि जब देश समाज में किसी महिला के कपड़े उतारे जाते हैं या फिर जेंटस ब्यूटी पार्लर में महिलाएं देह व्यापार करती पकड़ी जाती हैं तो मीडिया के लिए महिलाएं खबर बनती है। और उसे समय व हालात का हवाला देकर प्रसारित एवं प्रकाशित कर दिया जाता है। लेकिन जब यह सब पूरे होषो-हवास में किया गया हो तो उसे क्या कहेगें? ऐसे में सेक्स व यौन सर्वेक्षण के बहाने पत्रिकाओं ने जो नग्न व अर्द्धनग्न तस्वीरें छापी उसे लेकर सवाल उठना लाजमी है ?
प्रभाष जोशी के जन्म दिन (15 जुलाई) पर विशेष
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-संजय कुमार
जिनकी ओर प्रभाष जोशी आगाह करते रहे उन खतरों का परिणाम आज साफ नजर आ रहा है यही नहीं वे चिंताएं आज भी बरकरार हैं। पिछले लोकसभा और कुछ विधानसभा चुनाव के दौरान पैसे लेकर खबर छापने से मीडिया में जो हलचल पैदा हुई थी। उसे सामने लाने में जाने माने पत्रकार स्व. प्रभाष जोशी की भूमिका अहम रही थी। स्व. जोशी जी ने मीडिया के अंदर उपजे इस सोच के खिलाफ जब देश भर में मुहिम चला कर मीडिया की पोल खोलनी शुरू की थी, तो केवल मीडिया के अंदर ही भूचाल नहीं बल्कि मीडिया से जुडे आमखास लोग भी सकते में आ गय थे। पत्रकारों के बीच बहस भी छिड़ गयी थी। कोई पक्ष में तो कोई विरोध में खड़ा हो गया था।
यों तो प्रभाष जी लेखनी के लिए विख्यात रहे हैं खासकर क्रिकेट पर जब वे लिखते थे तो उनका एक खास अंदाज रहता था। लेखन के साथ-साथ मीडिया के ही खिलाफ लोगों को गोलबंद करने की उनकी मुहिम ने लोगों को चैंकाया था। मीडिया के अंदर घुसपैठ करते खबर छापने की नयी संस्कृति के खिलाफ स्व.जोशी ने देश भर में मुहिम छेड़ी थी। सेमिनारों और सभाओं में वे गरजे-बरसे थे। अंतिम सांस तक वे मीडिया में उत्पन्न पैसे लेकर खबर छापने की संस्कृति के खिलाफ एक जनादेश तैयार करने में जुटे रह थे। करीब पचास साल से ज्यादा समय से पत्रकारिता में योगदान दे चुके स्व. जोशी जी की बूढ़ी हड्डियों में जवानों जैसी जोश देखने को मिली थी। उनके इस मुहिम से मीडिया में घबराहट/बौखलाहट पैदा हो गया था। लोग गोलबंद भी हुए। हालांकि जोशी जी पर भी सवाल उठ थे। दोनों तरफ से हमला हुआ। इस हमले में एक बात साफ हुई वह यह कि मीडिया के चरित्र से आमलोग अवगत हुए। जो बड़ी बात थी। मीडिया को लेकर लोगों के मन में अविश्वा स पैदा हुआ। हालांकि स्व. जोशी जी के साथ कुछ मीडिया हाउस ही खड़े थे। जो लोगों को विकल्प देते मिले। प्रभाष जोशी व मीडिया दोनों एक दूसरे के पूरक रहे हैं। दोनों को अलग-अलग कर नहीं देखा जा सकता है। स्व.जोशी जी के मुहिम ने घबड़हाट जरूर पैदा कर दी थी।
मीडिया की यह घबड़हाट पटना में गत वर्ष बारह जून 09 को उस वक्त देखने को मिली थी जब स्व. जोशी लोकतंत्र का ढहता हुआ चौथा स्तंभ विषय पर अपने मुहिम के तहत पटना आये थे। चिलचिलाती धूप और उमस वाली गर्मी के बीच गांधी संग्रहालय पटना में हर वर्ग के लोग जोशी जी के इस मुहिम में सरीक दिख थे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा था कि– “पत्रकारिता के अंदर आज जो कुछ हो रहा है यह घंटी मेरे लिये बज रही है। पचास साल तक जिस काम को जिस गर्व के साथ किया उसकी हालत पर दुख होता है। महज पत्रकारिता से हम रोजी नहीं चला रहे हैं। उस काम को आज की परिस्थिति में देखता हू तो ऐसा लगता है उस पर एक रोलर चढ़ा देना पड़ेगा,तभी आगे का जीवन ठीक से चल सकता है। पत्रकारिता का फजीहत, उसका अंत हो, तो अपन ही मर रहे हैं। अपन से केवल पत्रकार का मतलब नहीं है। लोकतंत्र के वह सब लोग जो उस हथियार के साथ हमारे बाकी के भी लोकतंत्र के स्तम्भों पर नजर रखते हैं। पत्रकारिता किसी के मुनाफे या खुशी के लिए नहीं। बल्कि पत्रकारिता लोकतंत्र में साधारण नागरिक के लिये एक वो हथियार है जिसके जरिये वह अपने तीन स्तम्भों न्यायपालिका,विधायिका और कार्यपालिका की निगरानी करता है। अगर पत्रकारिता नष्ट होगी तो हमारे समाज से हमारे लोकतंत्र की निगरानी रखने का तंत्र समाप्त हो जायेगा। साथ ही लोकतंत्र पर उसके स्वतंत्र नागरिक व सच्चे मालिक का अधिकार का भी अंत होगा। इसलिये पत्रकारिता के साथ जो कुछ हो रहा है वह मात्र एक व्यावसायिक चिंता के नाते नहीं करना चाहिये। आज जब पत्रकारिता पर कोड़े बरसाता हूं या धिक्कारता हूं तो मेरी पीठ पर ही पड़ता है। जब पत्रकारिता के वर्तमान हालात पर गाली देने बैठता हूं तो इससे मेरा वजूद भी आहत होता है। पत्रकारिता जगत में आज जो हो रहा है वह सिर्फ एक व्यवसाय है। इसके मूल्य बिखर गए है। उद्देश्य बदल गये है। और इसका सिर्फ एक ही मकसद रह गया है वह है ज्यादा से ज्यादा से पैसे कमाना। चुनाव में जो कुछ हुआ वह धीरे-धीरे वर्षों से हो रहा था लेकिन इस बार लगभग पूरे देश में हुआ। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, मध्य प्रदेश,राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, सभी जगहें खबरें बिकी। पार्टियों ने और उम्मीदवारों ने यह तय किया कि अब तक अखबार वाले हम पर निगरानी करते थे हमारी चीजों को देखते, परख़ते हैं, हमारी करतूतों का भंडाफोड़ करते हैं और हम से अलग ऐसी शक्ति बनने की कोशिश करते हैं कि हमें भी नियंत्रित कर सके। ये परिस्थति उनको रास नहीं आती थी। इसलिये उन्होंने बड़े पैमाने पर कोशिश कर, इस बार देश की स्वतंत्र, निष्पक्ष और जांबाज प्रेस को, मीडिया को अपने में शामिल कर लिया। उम्मीदवारों ने इस बार तय किया कि अखबार वालों को कहेंगे कि हमारे बारे में जो भी छापते हो, जो आपकी इच्छा हो छापो, लेकिन हम जो कहते हैं वह भी छापो। और वह विज्ञापन में मत छापो। वह खबरों में छापो। अब अखबारों को इस बात पर उनको इंकार करना चाहिये था। क्योंकि खबर की जो जगह होती है वो अपनी ही देश में ही नहीं सारी दुनिया मे पवित्र जगह मानी जाती है। पवित्र इसलिये मानी जाती है कि दुनिया का कोई भी अखबार पढ़ने वाला पाठक अखबार उठाता है या अखबार खरीदता है तो विज्ञापन के लिये नहीं खरीता है। अखबार लोग खरीदते हैं, उठाते हैं, पढ़ने के लिये, उन्हें खबर चाहिये। बिना खबर के कोई अखबार पाठक खरीद कर नहीं पढ़ेगा। इस बात को सारी दुनिया जानती है। इस बात को विज्ञापन देने वाले भी जानते हैं इसलिये उनकी अब तक इच्छा थी कि हम जो विज्ञापन को दें उसके आस पास हमारी विरोध में कोई खबर नहीं छपनी चाहिये। चुनाव में बड़ा नाटकीय घटनाक्रम हुआ कि नेताओं ने कहा कि मेरा विज्ञापन मत छापो, उम्मीदवारों ने कहा कि हमारे विज्ञापन मत छापो, खबरें छापने के लिए जितना पैसा चाहते हो ले लो, तो अखबारों ने अपनी तरफ से पैकेज बनाया। फोटो, समाचार, इंटरव्यू के लिए अलग अलग पैसा तय किया गया। जिस तरह से विज्ञापन का रेट कार्ड छपता है उसी तरह से उम्मीदवारों को दिया गया। वहीं हर उम्मीदवार ने एक मीडिया सलाहकार अपने पास रखा जो कि खबरों को उनके अनुसार बनाकर देते गये। जब चुनाव होते हैं तो मीडिया की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। मीडिया कसौटी पर होता है। मीडिया का दायित्व है कि पाठक को सही-सही जानकारी दें। किसी भी देश में माना जाता है कि चुनाव के समय मीडिया सही-सही जानकारी दे। ये मीडिया का माना हुआ कर्तव्य है। अपने देश में अखबरों के लिये कमाई का सबसे बड़ा सिजन चुनाव था। मीडिया ने खबरों को विज्ञापन बनाकर बेच दिया। ऐसे में चौथा खंभा इस बार चुनाव में स्वतंत्र होकर खड़ा नहीं हुआ। तो उसकी भूमिका जो लोकतंत्र में निभानी की थी वो उसने नहीं निभायी। अब अगर चुनाव के वक्त ये भूमिका नहीं निभाते हैं तो कब निभायेंगे, चुनाव के वक्त मीडिया ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभायी। मीडिया अपनी निष्पक्ष भूमिका कब निभायेगी ,उन्होंने कहा कि मीडिया की जिम्मेदारी होती है कि वह निर्णायक क्षणों में पाठकों को सही-सही जानकारी दे,ताकि वह तय कर सके कि किस पार्टी व दल को वोट देना है। लेकिन, इस महती भूमिका को निभाने में मीडिया फेल हो गया। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, तीसरे स्तंभ के भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वतंत्र होकर खड़ा नहीं हो सका। पत्रकारिता पैसे वालों के हाथों बिक जायेगी, तो लोकतंत्र को मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी। लेग, पैग और मारूति की जिनकी लालसा है, वे पत्रकारिता में प्रवेश न करें, क्योंकि दलाली पत्रकारिता की मजबूरी नहीं है।”
जोशी जी की इस पीड़ा के खिलाफ वहीं पटना की मीडिया उनके इस मुहिम पर बटा दिखा था। जिन अखबारों के खिलाफ पैसे लेकर खबर छापने की संस्कृति पर स्व. जोशी गरजे- बरसे थे उन अखबारों ने उन्हें तब्बजों नहीं दी। दूसरी ओर अंग्रेजी अखबारों ने ब्लैक आउट कर दिया दिया था।
यह कटुता… घृणा…प्रभाष जोशी जी के विचारों के आगे बौनी नजर आयी हैं। हालांकि चर्चा होना लाजमी है। विचार व व्यक्ति की लड़ाई में मीडिया घालमेल करे तो परिणाम चैंकाने वाले हैं। जिन खतरों की ओर प्रभाष जोशी आगाह करते रहे उसकी परिणति आज साफ दिख रही है। तभी तो वह गुंज संसद और चुनाव आयोग में सुनाई दी । राज्यसभा में सांसदों ने पैसे लेकर मीडिया द्वारा खबर छापने की खतरनाक बढ़ती प्रवृति के खिलाफ गंभीर चर्चा की। यही नहीं सरकार से अनुरोध भी किया गया कि लोकतंत्र के हित में इस पर अंकुश लगाया जाये। सांसदों ने मीडिया द्वारा पैसे लेकर खबर छापने को लोकतंत्र के लिए घातक बताया। जबकि स्व. प्रभाष जोशी ने देश भर में मुहिम चलाकर इसे पत्रकारिता के लिए खतरनाक सोच करा दिया था। हालांकि उस समय राजनीति से जुड़े लोगों ने कोई कोहराम नहीं मचाया था। और न ही स्व. जोशी के साथ खड़े हुए । कुछ अखबार व पत्रकारों ने भले ही उनके साथ कंधा से कंधा मिलाया। लम्बे समय के बाद सत्ता के गलियारे में पहुंचने वाले गोलबंद हुए, अच्छी बात है लेकिन अनका दबाव कितना असरदार होगा यह तो आने वाले चुनाव के दौरान ही पता चल पायेगा। पैसे लेकर खबर छापने की मीडिया के सोच के खिलाफ केवल सांसद ही नहीं बल्कि पिछले ही दिनों मुख्य निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला ने भी चिंता व्यक्त की और इसे गलत करार भी दिया। भोपाल में नेशनल इलेक्शन वाच यानी राष्ट्रीय चुनाव निगरानी नामक स्वैच्छिक संगठन की ओर से आयोजित छठे राष्ट्रीय सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए श्री चावला ने पैसे लेकर खबर देने को सबसे गलत बताते हुए मीडिया से आग्रह किया कि इस बुराई को रोकने के लिए वे आत्म संयम अपनाये। श्री चावला ने कहा कि मीडिया को पैसे लेकर खबर देने की प्रवृति पर रोक लगाने के वास्ते स्वयं ही मानक तैयार करने होंगे। क्योंकि इससे लोकतंत्र को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है।
कहां खड़ी है आज पत्रकारिता?
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देखा जाए तो पत्रकारिता लोकतंत्र के खम्भे और जनता की हितों की रक्षा करने के दायित्व के लिए समझा जाता है। शुरू से अपने दायित्वों का निर्वाहन करते-करते मीडिया की आज स्थिति यह है कि वह दिन प्रति दिन विस्तार पा रहा है। छोटे से लेकर बड़े जगहों से पत्र-पत्रिकाओं का जहां प्रकाशन हो रहा है वहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अपने पांव तेजी से फैलाये जा रहा है। क्षेत्रीय होते अखबारों के तर्ज पर खबरिया व इंटरटेंमेंट चैनल भी चल रहे हैं। यही नहीं इंटरनेट पत्रकारिता का दौर भी शुरू हो चुका है। जहां खबरें हर जगह आ रही है, लेकिन क्या उसका स्वरूप, तेवर, मकसद और जज्बा नजर आ रहा है? जवाब में उत्तर ‘ नहीं ‘ में मिलता है। ऐसे में सवाल उपजता है कि आज पत्रकारिता कहां खड़ी है?
मिशन नहीं प्रोफेशन और फिर बाजारवाद के चोले में घुसते मीडिया के लिए ये रूचिकर शब्द बन गये हैं। मीडिया जन सेवक की भूमिका में न आकर कारोबारी की भूमिका में आज है। बड़े-बड़े पूंजीपति, उद्योगपति, भूमंडलीकरण के प्रभाव में इस उद्योग से जुड़ गये हैं। हालांकि उन्हें मीडिया से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन एक परिपाटी विकसित हुयी और यह कि मीडिया को जन हथियार और लोकतंत्र के रक्षक के तौर पर न पेश कर अपनी दुकानदारी चलाने में इस्तेमाल किया जाये? नतीजा सामने है, हर कोई मीडिया के इस्तेमाल धड़ल्ले से, करने से, बाज नहीं आ रहा। इसमें राजा (मालिक) और प्रजा दोनों शामिल हैं। राजा अपनी हितों के लिए इसे इस्तेमाल कर रहा है तो वहीं प्रजा भी अपनी बात को पहुंचाने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करने से नहीं चुक रही। राजा द्वारा संचालित मीडिया में उन्हीं बातों को दिखाया जाता है जो राजा चाहता है। तेजी से जनता के बीच घुसपैठ बनाने वाला, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जनता के सरोकारों से दूर होता जा रहा है। अपने टीआरपी या यों कहे चैनलों की भीड़ में अपने वजूद को बचाने के कषमोकष में ऐसी खबरों का प्रसारण करता है, जिसे जनता को कोई खास लेना-देना नहीं। खबर, खबर तो सही है लेकिन उस खबर को वह इतना खिंचता है कि जनता को ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरी खबर प्रायोजित की गई हो? कई उदाहरण सामने है जिसमें मीडिया ने वहीं दिखाया जो उसे अच्छा लगा।
‘माई नेम इज खान’ मामले को ही लें। कई खबरिया चैनलों ने पूरे विवाद को खूब भुनाया, वहीं बिहार में एक नक्सली हमले की खबर को बस खबर की तरह दिखाया गया। जाहिर है खबर है तो खबर की ही तरह दिखायी जायेगी। लेकिन ‘माई नेम इज खान’ फिल्म का मामला भी तो खबर की तरह ही था। फिर उसे लेकर मीडिया में पैषन क्यों? उसे भी खबर की तरह दिखाया जाना चाहिये था। ‘माई नेम इज खान’ का मामला मानवीय संवेदना से नहीं जुड़ा था, जुड़ा था तो सिर्र्फ प्रदर्षन को लेकर, वह भी सिर्फ मुबंई में। वहीं नक्सली हमले की खबर और उसमें मारे गये लोगों की संवेदना तो सामने आनी चाहिये थी? मीडिया द्वारा उसके कारणों की तलाश की जानी चाहिये थी? जो नहीं की गयी। जबकि ‘माई नेम इज खान’ के हीरो को मीडिया ने मंच दिया। देश की जनता से रूबरू कराया। सवाल दागे और जवाब पाये। पूरा कार्यक्रम फिल्मी अंदाज में पेश किया गया। यहां यह कहने से परहेज नहीं कि मीडिया का सिनेमाई होता रूप का भव्य प्रदर्शन दिखा। वहीं नक्सली हमलें की खबर पर कोई राष्ट्रीय चर्चा नहीं की गई। फिल्में आती है, जाती है लेकिन नक्सली हमले, आतंकवादी हमले में मारे गये लोग लौट कर नहीं आते? समस्याएं वहीं की वहीं खड़ी रहती है। इससे निपटने के लिए राष्ट्रीय सहमति, जनचेतना और जागरूकता को लाना भी मीडिया के मजबूत कंधे पर है। कुछ क्षणों के लिए राजनीतिक गलियारे में चिल्लमपोह की गुंज सुनाई पड़ती है।
हालांकि, कुछ मीडिया भी मामले को उठाते हैं, लेकिन जो बात सिनेमाई खबरों में होती है वह जन सराकरों से जुड़े खबरों में नहीं दिखती। जहां तक जनता का सवाल है जनता भी मीडिया का जमकर इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत हितों के लिए करती है। छोटी से छोटी घटना के लिए उसे बुला लेती है। लेकिन जन सराकारों की जब बातें आती है तो मीडिया को कोई नहीं बुलाता। मीडिया की अहम् भूमिका देश और समाज संस्कृति, धर्म, से जुड़े मुद्दों को जोड़ने में सार्थक कोशिश भी है लेकिन यह सब यह नहीं दिखता। राजनीतिक उठापटक में मीडिया की दिलचस्पी ज्यादा रहती है। हालांकि मीडिया के काम को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता है। समय-समय पर कई महत्वपूर्ण मुद्दों को इसने जिस तेवर के साथ उठाया वो काबिले तारिफ है। रूचिका-राठौर मामले को ही लें। इसे जाहिर है कि कितना से भी कितना शक्तिशाली क्यों न कोई हो उसे चाहे तो मीडिया जमीन पर ला सकता है और न्याय की आश में पथाराई आंखों में न्याय की उम्मीद जगा सकता है। यह सब कई घटनाओं में देखने को मिलता है। हालांकि इधर, जो भी कुछ मीडिया के अंदर देखा जा रहा है उसे बदलाव के तहत ही माना जा सकता है। बदलाव प्रकृति का नियम है। संभवत: इसे स्वीकार करते हुए इस बदलाव को हमे मान लेना चाहिए। हालांकि, उदयन शर्मा, रघुबीर सहाय, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, एम.जे. अकबर, की पत्रकारिता बरबस हमें याद दिला जाती है। नरसंहार की खबरें या फिर कालाजार, भूख आदि से हुई मौत की खबरें या फिर जनसरोकारों से जुड़ी वह तमाम खबरें, जिसे लिखने के बाद सरकार तक को भी जवाब देना पड़ता था। आज वह सब कुछ नहीं दिखता। ऐसा कुछ लिखा नहीं जा रहा जिससे काला विधेयक यानी प्रेस पर अंकुष लगने का मामला बने। कहा जा सकता है कि मीडिया आज नाप तौल कर बातों/ मुद्दों को उठा रहा है जिसमें कोई विवाद न हो! हालांकि मुद्दें हैं, खबरें हैं, खबरें जरूर आ जाती है लेकिन खबर के पीछे सच क्या है वह नहीं आ पाता। लोगों से दूर होती मीडिया, बाजारवाद के गिरफ्त में मीडिया, सिनेमाई होती मीडिया, सनसनी होती मीडिया आदि जुमले के झंझावाद में मीडिया फंस कर रह गया है।
मीडिया में ‘साहित्य’ का बाजारीकरण
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वर्षों से मीडिया में अपनी पैठ बना चुके साहित्य को भी पूंजीवादी संस्कृति ने नहीं बख्शा है। इसके झंझावाद में फंसे साहित्य की कसमसाहट भी सामने दिखती हैं। व्यवसायिक होती मीडिया ने खबरों को माल की तरह बेचना प्रारंभ कर दिया है। बदलते परिवेश में साहित्य के लिए मीडिया कोई जगह नहीं। आज मीडिया में ‘साहित्य’ का बाजारीकरण हो गया है।
प्रिंट हो या फिर इलैक्ट्रोनिक मीडिया, साहित्य का दायरा धीरे-धीरे सिमटता ही जा रहा है। पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि पहले अधिकांशत: साहित्यिक अभिरूचि वाले लोग ही पत्र-पत्रिकाओं का संपादन कार्य किया करते थे। यही नहीं, पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य को खास अहमियत दी जाती रही थी। पत्रकारिता का जन्म साहित्यिक अभिरूचि का ही परिणाम है। इस बात को दरकिनार कर दिया गया।
हिन्दी पत्रकारिता के उदय काल में भी ऐसे कई पत्र थे, जिनमें राष्ट्रीय चेतना की उद्बुद्ध सामग्री होने के साथ-साथ साहित्यिक सामग्री प्रचुर मात्रा में रहा करती थी। ‘भारत मित्र’, ‘बंगवासी’, ‘मतवाला’, ‘सेनापति’, ‘स्वदेश’, ‘प्रताप’, ‘कर्मवीर’, ‘विश्वमित्र’, आदि कई पत्रों में साहित्य को खासा स्थान दिया जाता था। भारतेन्दु काल में ही हिन्दी साहित्य की आधुनिकीकरण की प्रकिया की शुरुआत हुई थी। इसी दौर में हिन्दी पत्रकारिता का विकास उत्तरोत्तर होता रहा। भारतेन्दु जी के संपादन में ‘कविवचन सुधा’, ‘हरिश्चन्द्रचन्द्रिका’, ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ और ‘बाला-बोधिनी’ में समसामयिक विषयों के अलावा साहित्य को खास महत्व दिया गया। भारतेन्दु युग में साहित्यिकारों ने पत्रकारिता के माध्यम से साहित्य को दिशा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बालकृष्ण भट्ट ने ‘हिन्दी प्रदीप’ और प्रताप नारायण मिश्र ने ‘ब्राहम्ण’ पत्र निकाल कर कार्य को आगे बढ़ाया। वहीं द्विवेदी युग में ‘सरस्वती’ के बारे में कहा जाता है कि यह साहित्य और पत्रकारिता के एक पर्याय के रूप में सामने आया था। ‘सरस्वती’ ने साहित्य और पत्रकारिता के मानदंडों की जो पृष्ठभूमि बनायी, वह आज भी मिसाल है। ‘सरस्वती’ ने जो सिलसिला प्रारंभ किया था उसे और व्यापक बनाने में ‘माधुरी’, ‘सुधा’, ‘मतवाला’, ‘समन्वय’, ‘विशाल भारत’, ‘चांद’, ‘हंस’, आदि पत्रों ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
आजादी के बाद भी कई ऐसे साहित्यकार सक्रिय रहे जिन्होंने साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता से जुड़ कर साहित्य के प्रचार प्रसार में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। ‘विशाल भारत’, ‘दिनमान’, ‘नवभारत टाइम्स’ से अज्ञेय जुड़े रहे, तो ‘धर्मयुग’ से धर्मवीर भारती और ‘सारिका’ से कमलेश्वर। हालांकि कमलेश्वर ‘श्रीवर्षा’ और ‘गंगा’ के भी संपादक रहे। राजेन्द्र यादव ‘हंस’, रघुवीर सहाय ‘दिनमान’, भैरव प्रसाद गुप्ता, भीष्म साहनी एवं अमृतराय ‘नयी कहानी’, शैलेश मटियानी ‘विकल्प’, महीप सिंह ‘संचेतना’, मनोहर श्याम जोशी ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ आदि कई चर्चित साहित्यकार हैं जिन्हें साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता के लिये भी जाना जाता है। उस दौर के सारे पत्र बडे पूंजीपति घरानों से ही संबध्द थे और आज भी हैं, लेकिन आज एक बड़ा बदलाव आ गया है ।
बढ़ते खबरिया चैनलों के बीच साहित्य को उतना स्थान नहीं मिल पा रहा है जो आकाशवाणी या दूरदर्शन पर मिलता रहा है। हालांकि इसमें भी गिरावट देखी जा रही हैं। आकाशवाणी से समय समय पर कई साहित्यिकार जुडे। भगवतीचरण वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, नरेंद्र शर्मा, फणीश्वर नाथ रेणु, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय आदि कई साहित्यकार हैं जो आकाशवाणी से जुड़े रहे। वहीं, दूरदर्शन पर भी साहित्य की विभिन्न विधाओं का नियमित प्रचार प्रसार होता रहा है। एक समय था जब दूरदर्शन पर भीष्म साहनी की ‘तमस’ को दिखाया गया, तो घर-घर में साहित्य की चर्चा होने लगी थी। कई चर्चित साहित्यकारों की कृतियों को लेकर धारावाहिक बनें। जिनमें प्रेमचंद की निर्मला, शरत चन्द्र का ‘श्रीकांत’, रेणु का ‘मैला आंचल’, विमल मित्र की ‘मुजरिम हाजिर हो’, श्रीलाल शुक्ल की ‘रागदरबारी’, आर.के.नारायणन का ‘मालगुडी डेज’ आदि काफी चर्चित रहा है। अब रियलीटी शो का जमाना है। सच के नाम पर, सनसनी के नाम,रोमांच पैदा करने के नाम पर आदि आदि …..।
खबर को मसालेदार बना कर बेचे जाने के बीच साहित्य नही के बराबर है। हर कोई मीडिया प्रेम को छोड़ नहीं पा रहा है। बाजारवाद की वजह से आम खास होते मीडिया की मोह-माया से साहित्य भी नहीं बच पाया है। साहित्य को आम खास तक पहुंचाने के लिए मीडिया का सहारा लेना पडता है। जाहिर है पत्र-पत्रिकाएं ही साहित्य को आम और खास लोगों तक पहुंचा सकती है। शायद ही कोई ऐसा पत्र हो जिसमें साहित्य किसी न किसी रूप में न छपता हो। इसके बावजूद मीडिया का रवैया साहित्य के साथ अच्छा नहीं प्रतीत होता है। तभी तो समाचार पत्रों के आकलन से साफ तौर पर पता चलता है कि अमूमन सभी अखबार साहित्य की दो से तीन प्रतिशत ही खबरें प्रकाशित करते हैं।
साहित्य, मीडिया में आज केवल ‘फिलर’ के रूप में दिखता है। खास तौर से प्रिंट मीडिया ने बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के बढ़ते प्रकोप में साहित्य को वस्तु के रूप में ही रखा है। वर्षो से सप्ताह में साहित्य को पूरा एक पेज देने वाले अखबार अब विज्ञापन को प्राथमिकता दे रहे हैं। विज्ञापन विभाग इतना हावी है कि साहित्य के बने पूरे पृष्ठ को अंतिम क्षण में बदलवा देता है।
मजेदार बात यह है कि यह सब कुछ खेल या फिर सिनेमा के नियमित फीचर पेज के साथ कतई नहीं होता है। और यह सब हर स्तर पर छपने वाले अखबारों के साथ होता है। अमूमन राष्ट्रीय और स्थानीय अखबार अपने फीचर पेज में साहित्य से संबंधित सामग्री छापते हैं। मासिक-साप्ताहिक व्यवसायिक पत्रिकाएं भी साहित्य को वैसे ही देख रहे हैं जैसे अखबार। इंडिया टुडे का साहित्यिक विशेषांक का लोगों को खासा इंतजार रहता था। वहीं पर कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों का भी विशेषांक छपना लगभग बंद हो गया है। गिनी चुनी पत्र-पत्रिकाएं ही कभी-कभार साहित्यिक विशेषांक निकालते हैं।
पिछले कई वर्षो से अखबारों के चरित्र में व्यापक बदलाव हुआ है। किसी पत्र में रविवारीय परिशिष्ट को अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है जिसमें हर विधा पर सामग्री होती है और उसमें साहित्य को खासा स्थान दिया जाता है। लेकिन आज उसमें भी ठहराव साफ दिखता है। रविवारीय परिशिष्ट आज भूत-प्रेत, रहस्य, अपराध और सिनेमा को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। उसमें साहित्य को ढूंढ़ना पड़ता है। बाजार के मुताबिक फिल्म, सेहत, तंत्र-मंत्र, मनोंरजन, अपराध, भविष्यवाणी, और रेसिपी आदि के बढ़ते क्रेज के सामने साहित्य दबता जा रहा है। जहां थोडी सी जगह मिल भी जा रही है, उसके संपादक के साहित्य प्रेम को ही आधार माना जा सकता है।
चर्चित साहित्यकारों के जन्म दिन या साहित्यिक समाराहों को तरजीह न देकर फिल्मी हीरो-हीरोइनों के विवाह करने, मंदिर जाने जैसी खबरों को खास बनाते हुए पूरा परिशिष्ट निकालने में मीडिया मषगूल है। चर्चित साहित्यकार कमलेश्वर के निधन की खबर को ही लें, कितनों ने खास परिशिष्ट निकाला वह आपके सामने है? इसमें केवल पत्र ही शामिल नहीं बल्कि खबरिया चैनल भी शामिल है। किसी साहित्यकार पर उनका फोकस नहीं होता है। वहीं पर अश्लील और फूहड़ चुटकुलों से लोगों को हंसाने जैसे कार्यक्रम को दिखाने की होड़ लगी रहती है। यों तो साहित्य की खबरें चैनलों पर आती नहीं, आती भी है तो चंद मिनटों में समेट दी जाती है।
साहित्य व साहित्यिकारों से जुड़ी खबरें स्थान पाती भी है तो मुष्किल से वहीं हीरो-हीरोइन-खिलाड़ियों को ज्यादा तरजीह दी जाती है। जाहिर है साहित्य नहीं बिकता और जो बिकता है उसे मीडिया तरजीह देने में लगी है।
क्याह है दलित पत्रकारिता की दशा और दिशा?
17 June 2010 3 Comments
♦ संजय कुमार
‘आज जितने भी समाचार पत्र मौजूद हैं, वे हिंदू जाति के हितों की रक्षा करने में लगे हुए हैं। वे अन्य जातियों के हितों की ओर दृष्टिपात नहीं करते हें। हमारा देश विषमताओं का मायका है। सत्ता और ज्ञान के अभाव में अब्राह्मण तथा दलित वर्ग प्रगति से वंचित है’
डॉ भीम राव अंबेडकर (21 जनवरी 1920 के साप्ताहिक ‘मूकनायक’ के प्रथम अंक के संपादकीय में प्रकाशित)
डॉ भीम राव अंबेडकर के विचार आज भी प्रासंगिक है। देश में सवर्ण पत्रकारिता या यों कहें कि हिंदू पत्रकारिता की दिशा व दशा दोनों तो दिखती है, लेकिन दलित पत्रकारिता की नहीं? दलित पत्रकारिता की दशा और दिशा को लेकर सवाल उठते रहते हैं। इन दिनों दलित पत्रकारिता को लेकर काफी विमर्श सुनने को मिलता है। हिंदूवादी पत्रकारिता ने जो पकड़ बनायी है, उसके समांनातर दलित पत्रकारिता नहीं के बराबर है। ऐसा नहीं कि दलित पत्रों का प्रकाशन नहीं होता। बड़े पैमाने पर दलित पत्र और पत्रिकाओं का प्रकाशन देश भर में हो रहा है। लेकिन उनमें एकाध नाम भी नहीं मिलते, जो राष्ट्रीय पटल पर छपने वाली सवर्ण पत्र-पत्रिकाओं के समानांतर खड़े हों।
महाराष्ट्र की दलित पत्रकारिता को छोड़ दें, तो इसमें हिंदी पत्रकारिता कोई खास मुकाम नहीं तय कर पायी है। हालांकि हिंदूवादी पत्रकारिता में दलित पत्रकारिता भी दिखती है। इसके पीछे बाजारवाद एक बहुत बड़ा कारण है। ज्योतिबा फूले, बाबा साहेब अंबेडकर सहित अन्य दलित नेताओं के जयंती समारोहों की खबर को जगह मिल जाया करती है। यह एक बहुत बड़ा भ्रम है, जो दलित पत्रकारिता के सामने आकर खड़ा हो जाता है कि दलित समुदाय की बात हिंदूवादी मीडिया ने सहज ढंग से उठायी। हालांकि दलितों की चीज छापकर हिंदूवादी मीडिया उसे दलित पत्रकारिता की श्रेणी में डालकर अपनी वाहवाही तो ले लेती है लेकिन ये दलित मीडिया को स्थापित नहीं करती। राष्ट्रीय पटल पर भले ही यह बात दलित समुदाय के बीच हिंदूवादी पत्रकारिता के माध्यम से पहुंचती हो लेकिन वह तेवर नहीं झलकता। जिन मुद्दों को लेकर ज्योतिबा फूले, अंबेडकर सहित अन्य दलित बुद्धिजीवियों ने दलित समाज को मुख्यधारा से जोड़ने का बीड़ा उठाया था, वह जयंती समारोहों के अवसर पर ही क्यों दिखता है।
दोष केवल हिंदूवादी पत्रकारिता को नहीं दिया जा सकता। इसने तो दलितों की खबर को बाजार की तरह इस्तेमाल किया। लेकिन वहीं पर दलित पत्रकारिता से जुड़ी सैकड़ों पत्र-पत्रिकाएं हैं, जो हिंदूवादी पत्र-पत्रिकाओं के सामने अभी तक खड़ी नहीं हो पायी हैं। दलित पत्रकारिता में वह व्यावसायिक नजरिया नहीं दिखता। दलित पत्रकारिता से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि ढेरों दलित पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है, लेकिन उनके आकलन से बात चौंकाती है कि वे पत्रकारिता के मापदंडों के अनुरूप खरे नहीं उतरते। इनके अध्ययन से स्पष्ट होता है कि इनके संपादक वह सोच विकसित नहीं कर पाये हैं, जो व्यावसायिक रूप से पत्रकारिता के दृष्टिकोण में होने चाहिए। मसलन कोई पाठक पत्र लिखता है, तो कुछ संपादक हू-ब-हू उसे बिना संपादन के छाप देते हैं। अगर कोई पाठक यह लिखता है कि मैं पत्र-पत्रिका का वार्षिक ग्राहक बनना चाहता हूं और इसके लिए पैसे भेज रहा हूं तो कुछ संपादक इसे भी हू-ब-हू छाप देते हैं। पत्र को संपादित करने की जहमत तक नहीं उठाते हैं। जबकि पत्रकारिता के दृष्टिकोण से किसी भी पत्र पत्रिकाओं में छपने वाले पाठकों के पत्रों की अपनी अहमियत होती है। पाठक पत्र के माध्यम से अपने विचार लोगों तक पहुंचाता है। एक वैचारिक सोच की गोलबंदी करता है।
दलित पत्र-पत्रिकाएं छपती तो हैं, लेकिन उसके खरीददारों में आम लोगों की बात तो दूर, दलित समुदाय द्वारा भी नहीं खरीदे जाने का आरोप-प्रत्यारोप दलित पत्र पत्रिकाओं के संपादक-मालिक लगाते रहते हैं। कई दलित पत्र-पत्रिकाएं छप रही हैं, उसके मालिक ही संपादक होते हैं और अपने को स्थापित करने के लिए उसका प्रकाशन करते हैं। ऐसा नहीं कि उनका नाम भारतीय मीडिया में नहीं लिया जाता, बल्कि वे मीडिया में स्थापित हैं। लेकिन उनकी दूरदृष्टि संकुचित दिखती है। वे वही करते हैं, जिससे वे स्थापित रह सकें। मीडिया के बाजार में खड़े रहने के लिए हिंदूवादी मीडिया के समानांतर अपने को खड़ा रखने के लिए गोलबंदी नहीं करते। उनकी शिकायत रहती है कि अपने समुदाय के लोग भी उसे नहीं खरीदते हैं। सवाल है कि पाठक भले ही दलित समुदाय के हों, जब बाजार खुला है, तो जो आकर्षित करेगा उसे पाठक खरीदेगा – का र्फामूला लागू हो जाता है। यह हर विधा की पत्र-पत्रिका के साथ है।
दलित पत्र-पत्रिकाओं के लोकप्रिय नहीं होने के पीछे पत्रकारिता के मापदंडों को ही सामने रखना पड़ता है। हालांकि इसके पीछे दलित पत्र-पत्रिकाओं की दिशाहीनता का आरोप भी लगता है कि दलित पत्र-पत्रिकाओं में व्यावसायिक नजरिया नहीं होता। सबसे पहले हिंदूवादी पत्रकारिता के समक्ष दलित पत्रकारिता को खड़ा होने के लिए व्यावसायिक नजरिया होना बहुत जरूरी है और वह नजरिया खबर के आगे-पीछे तो होनी ही चाहिए, साथ ही पत्र-पत्रिका लोगों तक पहुंचे, इसके लिए भी एक नजरिया विकसित करना होगा। यह विकसित तभी होगा जब व्यापक पैमाने पर व्यावसायिक दृष्टिकोण अपनाते हुए समाज के सामने दलित मीडिया आये और अपनी बातों को रखने के लिए हर चुनौतियों को स्वीकार करे। हालांकि दलित पत्र-पत्रिकाओं के स्वामी संपादक अपनी पत्रकारिता के दृष्टिकोण की विफलता के लिए पाठकों पर आरोप लगाने से परहेज नहीं करते। दरअसल सबसे पहले उन्हें अपनी दिशाहीनता को ही दूर करनी होगी। ऐसा नहीं है कि हिंदूवादी राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाएं दलितों की खबरों को या फिर ज्योतिबा फूले, बाबा साहेब अंबेडकर जैसे दलित नेताओं के विचारों को प्रकाशित नहीं करते। दलित नेताओं की जयंती हो या फिर कोई आयोजन, दलित मुद्दों को व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाएं जरूर उठाती हैं और वह व्यापक दायरे वाले पाठकों के बीच पहुंच जाता है जबकि दलित पत्र पत्रिकाएं दलित मुद्दों से जुड़ी खबरों तक पहुंच पाने में देरी कर जाते हैं। दलित पाठक वर्ग चाहता है कि वह दलितों की खबरों के साथ-साथ देश-प्रदेश की घटने वाली तमाम खबरों से रू-ब-रू हो लेकिन दलित मीडिया इसे पूरा करने में असफल रहता है।
हालांकि बहुत सी ऐसी पत्र पत्रिकाएं हैं, जिनका कोई व्यावसायिक नजरिया या पत्रकारिता की दृष्टि में कोई मूल्य नहीं है, फिर भी वे चल रही हैं। वहीं दलित विमर्श की कोई बात सामने आने पर उनकी ओर तुरंत ही उंगली उठ जाती है। उसका व्यवसायिक पक्ष ढूंढा जाने लगता है। पत्रकारिता का मापदंड भी उसके लिए स्थापित किये जाने लगते हैं।
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खामोश, मीडिया में दलितों के लिए कोई जगह नहीं है!
30 May 2010 6 Comments
♦ संजय कुमार
आजादी के दौरान दलितों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के प्रयास विभिन्न आयामों पर शुरू हुए थे। जहां ज्योतिबा फुले इसके अग्रदूत थे तो वहीं भारतीय संविधान के जनक और दलितों के महानायक डॉ भीम राव अंबेदकर ने दलित चेतना को एक नयी दिशा दी। ब्राह्मणवादी संस्कृति को चुनौती देते हुए दलितों को मुख्यधारा में लाने का जो प्रयास हुआ, उससे दलित समाज में एक नयी चेतना का संचार हुआ। धीरे-धीरे लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने को गोलबंद कर ब्राह्मणवादी व्यवस्था को धकेलने का प्रयास शुरू हुआ। दलित-पिछड़ों ने सामाजिक व्यवस्था में समानता को लेकर अपने को गोलबंद किया। हालांकि आजादी की आधी सदी बीत जाने के बाद भी समाज के कई क्षेत्रों में आज भी असमानता का राज कायम है।
आरक्षण के सहारे कार्यपालिका, न्यायापालिका, विधायिका आदि में दलित आये लेकिन आज भी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकतंत्र के चौथे खंभे पर काबिज होने में दलित पीछे ही नहीं बल्कि बहुत पीछे हैं। आकड़े इस बात के गवाह हैं कि भारतीय मीडिया में वर्षों बाद आज भी दलित-पिछड़े हाशिये पर हैं। उनकी स्थिति सबसे खराब है। कहा जा सकता है कि ढूंढते रह जाओगे लेकिन दलित नहीं मिलेंगे। गिने चुने ही दलित मीडिया में हैं और वह भी उच्च पदों पर नहीं।
‘राष्ट्री य मीडिया पर ऊंची जातियों का कब्जा’ के तहत हाल ही में आये सर्वे ने मीडिया जगत से जुड़े दिग्गजों की नींद उड़ा दी थी। आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला। किसी ने समर्थन में दलित-पिछड़ों को आगे लाने की पुरजोर शब्दों में वकालत की। तो किसी ने यहां तक कह दिया कि भला किसने उन्हें मीडिया में आने से रोका है। मीडिया के दिग्गजों ने जातीय असमानता को दरकिनार करते हुए योग्यता का ढोल पीटा और अपना गिरेबान बचाने का प्रयास किया।
दलित-पिछड़े केवल राष्ट्री य मीडिया से ही दूर नहीं है बल्कि राज्यस्तरीय मीडिया में भी उनकी भागीदारी नहीं के बराबर है। वहीं ऊंची जातियों का कब्जा स्थानीय स्तर पर भी देखने को मिलता है। समाचार माध्यमों में ऊंची जातियों के कब्जे से इनकार नहीं किया जा सकता है। मीडिया स्टडी ग्रुप के सर्वे ने जो तथ्य सामने लाये हालांकि वह राष्ट्री य पटल के हैं लेकिन कमोबेश वही हाल स्थानीय समाचार जगत का है। जहां दलित-पिछडे़ खोजने से मिलेंगे। आजादी के वर्षों बाद भी मीडिया में दलित-पिछड़े हाशिये पर हैं। मीडिया के अलावा कई क्षेत्र हैं, जहां अभी भी सामाजिक स्वरूप के तहत प्रतिनिधित्व करते हुए दलित-पिछड़ों को नहीं देखा जा सकता है, खासकर दलित वर्ग को। आंकड़े बताते हैं कि देश की कुल जनसंख्या में मात्र आठ प्रतिशत होने के बावजूद ऊंची जातियों का, मीडिया हाउसों पर 71 प्रतिशत शीर्ष पदों पर कब्जा बना हुआ है। जहां तक मीडिया में जातीय व समुदायगत होने का सवाल है, तो आंकड़े बताते हैं कि कुल 49 प्रतिशत ब्राह्मण, 14 प्रतिशत कायस्थ, वैश्य/जैन व राजपूत सात-सात प्रतिशत, खत्री नौ, गैर द्विज उच्च जाति दो और अन्य पिछड़ी जाति चार प्रतिशत है। इसमें दलित कहीं नहीं आते।
मीडिया में जाति हिस्सेदारी से बवाल उठना ही था। जो वस्तुस्थिति है, वह सामने है। सरकारी मीडिया को छोड़ दें तो निजी मीडिया में जो भी नियुक्ति होती है, वह इतने ही गुपचुप तरीके से होती है कि मीडिया हाउस के कई लोगों को बाद में पता चलाता है कि फलाने ने ज्वाइन किया है। खैर बात जाति की हो रही है। आंकड़े/सर्वे चौंकते हैं, मीडिया के जाति प्रेम को लेकर! पोल खोलते हैं प्रगतिशील बनने वालों का और उन पर सवाल भी दागते हैं।
बिहार को ही लें, ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ के सवाल पर हाल ही में पत्रकार प्रमोद रंजन ने भी जाति प्रेम की पोल खोली है। हालांकि राष्ट्री य सर्वे में अनिल चमड़िया, जितेंद्र कुमार और योगेंद्र यादव ने जो खुलासा किया था, उसने देश के क्षेत्रीय मीडिया हाउसों के जाति प्रेम को भी अपने घेरे में लिया था।
बिहार, मीडिया के मामले में काफी संवेदन व सचेत माना जाता है। लेकिन, यहां भी हाल राष्ट्री य पटल जैसा ही है। ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ में साफ कहा गया है कि बिहार की राजधानी पटना में काम कर रहे मीडिया हाउसों में 87 प्रतिशत सवर्ण जाति के हैं। इसमें ब्राह्यण 34, राजपूत 23, भूमिहार 14 एवं कायस्थ 16 प्रतिशत है। हिंदू पिछड़ी-अति पिछड़ी जाति, अशराफ मुसलमान और दलित समाज से आने वाले मात्र 13 प्रतिशत पत्रकार हैं। इसमें सबसे कम प्रतिशत दलितों की है। लगभग एक प्रतिशत ही दलित पत्रकार बिहार के मीडिया से जुड़े हैं। वह भी कोई ऊंचे पद पर नहीं हैं। महिला सशक्तीडकरण के इस युग में दलित महिला पत्रकार को ढूंढना होगा। बिहार के किसी मीडिया हाउस में दलित महिला पत्रकार नहीं के बराबर है। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि दलित महिला पत्रकारों का प्रतिशत शून्य है। जबकि पिछडे़-अति पिछड़े जाति की महिला पत्रकारों का प्रतिशत मात्र एक है। साफ है कि दलित-पिछड़े वर्ग के लोग पत्रकारिता में हाशिये पर हैं।
भारतीय परिदृश्य में अपना जाल फैला चुके सेटेलाइट चैनल यानी खबरिया चैनलों की स्थिति भी कमोबेश एक ही जैसी है। यहां भी कब्जा सवर्ण हिंदू वर्ग का ही है। 90 प्रतिशत पदों पर सवर्ण काबिज हैं। हालांकि हिंदू पिछड़ी जाति के सात प्रतिशत, अशराफ मुसलमान तीन एवं महिलाएं 10 प्रतिशत हैं। यहां भी दलित नहीं हैं।
मीडिया में दलितों की नहीं के बराबर हिस्सेदारी भारतीय सामाजिक व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। सर्वे या फिर सामाजिक दृष्टिकोण के मद्देनजर देखा जाए तो आजादी के बाद भी दलितों के सामाजिक हालात में क्रांतिकारी बदलाव नजर नहीं आता। बस कहने के लिए राजनीतिक स्तर पर उन्हें मुख्यधारा में लाने के हथकंडे सामने आते हैं, जो हकीकत में कुछ और ही बयां करते हैं। तभी तो जब देश में अन्य पिछड़ी जातियों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को लेकर विरोध और समर्थन चल रहा था, तभी पांडिचेरी के प्रकाशन संस्थान ‘नवयान पब्लिशिंग’ ने अपनी वेबसाइट पर दिये गये विज्ञापन में ‘बुक एडिटर’ पद के लिए स्नातकोत्तर छात्रों से आवेदन मांगा और शर्त रख दी कि ‘सिर्फ दलित ही आवेदन करें।’ इस तरह के विज्ञापन ने मीडिया में खलबली मचा दी। आलोचनाएं होने लगीं। मीडिया के ठेकेदारों ने इसे संविधान के अंतर्गत जोड़ कर देखा। यह सही है या गलत – इस पर राष्ट्री य बहस की जमीन तलाशी गयी। दिल्ली के एक समाचार पत्र ने इस पर स्टोरी छापी और इसके सही गलत को लेकर जानकारों से सवाल दागे। प्रतिक्रिया स्वरूप संविधान के जानकारों ने इसे असंवैधानिक नहीं माना। वहीं, सवाल यह उठता है कि अगर ‘नवयान पब्लिशिंग’ ने खुलेआम विज्ञापन निकाल कर अपनी मंशा जाहिर कर दी तो उस पर आपत्ति कैसी? वहीं गुपचुप ढंग से मीडिया हाउसों में ऊंची जाति के लोगों की नियुक्ति हो जाती है, तो कोई समाचार पत्र उस पर बवाल नहीं करता है और न ही सवाल उठाते हुए स्टोरी छापता है?
कुछ वर्ष पहले बिहार की राजधानी पटना से प्रकाशित एक राष्ट्री य हिंदी दैनिक ने जब अपने कुछ पत्रकारों को निकाला था, तब एक पत्रिका ने अखबार के जाति प्रेम को उजागर किया था। पत्रिका ने साफ-साफ लिखा था कि निकाले गये पत्रकारों में सबसे ज्यादा पिछड़ी जाति के पत्रकारों का होना अखबार का जाति प्रेम दर्शाता है। जबकि निकाले गये सभी पत्रकार किसी मायने में सवर्ण जाति के रखे गये पत्रकारों की काबिलियत से कम काबिल नहीं थे।
जरूरी काबिलियत के बावजूद मीडिया में अभी तक सामाजिक स्वरूप के मद्देनजर दलित-पिछड़ों का प्रवेश नहीं हुआ है। जाहिर है, कहा जाएगा कि किसने आपको मीडिया में आने से रोका? तो हमें इसके लिए कई पहलुओं को खंगालना होगा। सबसे पहले मीडिया में होने वाली नियुक्ति पर जाना होगा। मीडिया में होने वाली नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए चर्चित मीडियाकर्मी राजकिशोर का मानना है कि दुनिया भर को उपदेश देने वाले टीवी चैनलों में, जो रक्तबीज की तरह पैदा हो रहे हैं, नियुक्ति की कोई विवेकसंगत या पारदर्शी प्रणाली नहीं है। सभी जगह सोर्स चल रहा है। वे मानते हैं कि मीडिया जगत में दस से पचास हजार रुपये महीने तक की नियुक्तियां इतनी गोपनीयता के साथ की जाती हैं कि उनके बारे में तभी पता चलता है, जब वे हो जाती हैं। इन नियुक्तियों में ज्यादातर उच्च जाति के ही लोग आते हैं। इसकी खास वजह यह है कि मीडिया चाहे वह प्रिंट (अंग्रेजी-हिंदी) हो या इलेक्ट्रानिक, फैसले लेने वाली सभी जगहों पर उच्च वर्ण की हिस्सेदारी 71 प्रतिशत है। जबकि उनकी कुल आबादी मात्र आठ प्रतिशत ही है। उनके फैसले पर सवाल उठे या न उठे, इस सच को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
वहीं दूसरे पहलू के तहत जातिगत आधार सामने आता है और प्रख्यात पत्रकार अनिल चमड़िया कास्ट कंसीडरेशन को सबसे बड़ा कारण मानते हैं। चमड़िया ने अपने सर्वे का हवाला देते हुए बताया है कि मीडिया में फैसले लेने वालों में दलित और आदिवासी एक भी नहीं हैं। जहां तक सरकारी मीडिया का सवाल है, तो वहां एकाध दलित-पिछड़े नजर आ जाते हैं। चमड़िया कहते हैं कि देश की कुल जनसंख्या में मात्र आठ प्रतिशत ऊंची जाति की हिस्सेदारी है और मीडिया हाउसों में फैसले लेने वाले 71 प्रतिशत शीर्ष पदों पर उनका कब्जा बना हुआ है। यह बात स्थापित हो चुकी है और कई लोगों ने अपने निजी अनुभवों के आधार पर माना है कि कैसे कास्ट कंसीडरेशन होता है। यही वजह है कि दलितों को मीडिया में जगह नहीं मिली। जो भी दलित आये, वे आरक्षण के कारण ही सरकारी मीडिया में आये। रेडियो-टेलीविजन में दलित दिख जाते हैं, दूसरी जगहों पर कहीं नहीं दिखते। जहां तक मीडिया में दलितों के आने का सवाल है, तो उनको आने का मौका ही नहीं दिया जाता है। चमड़िया का मानना है कि मामला अवसर का है, हमलोगों का निजी अनुभव यह रहा है कि किसी दलित को अवसर देते हैं, तो वह बेहतर कर सकता है। यह हमलोगों ने कई प्रोफेशन में देख लिया है। दलित डाक्टर, इंजीनियर, डिजाइनर आदि को अवसर मिला, तो उन्होंने बेहतर काम किया। दिल्ली यूनिवर्सिटी में बेहतर अंग्रेजी पढ़ाने वाले लेक्चररों में दलितों की संख्या बहुत अच्छी है, यह वहां के छात्र कहते हैं। बात अवसर का है और दलितों को पत्रकारिता में अवसर नहीं मिलता है। पत्रकारिता में अवसर कठिन हो गया है। उसको अब केवल डिग्री नहीं चाहिए। उसे एक तरह की सूरत, पहनावा, बोली चाहिए। मीडिया प्रोफेशन में मान लीजिए कोई दलित लड़का पढ़कर सर्टिफिकेट ले भी ले और वह काबिल हो भी जाए, तकनीक उसको आ भी जाए, तो भी उसकी जाति डेसिमिनेशन का कारण बन जाता है।
पत्रकारिता में दलितों की हिस्सेदारी या फिर उनके प्रति सार्थक सोच को सही दिशा नहीं दी गयी। तभी तो हिंदी पत्रकारिता पर हिंदू पत्रकारिता का भी आरोप लगता रहा है। हंस के संपादक और चर्चित कथाकार-आलोचक राजेंद्र यादव ने एक पत्रिका को दिये गये साक्षात्कार में माना है कि हिंदी पत्रकारिता पूर्वाग्रही और पक्षपाती पत्रकारिता रही है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे वरिष्ठर पत्रकार ने भी अपनी पत्रकारिता के दौरान वर्णव्यवस्था के प्रश्न पर कभी कोई बात नहीं की। इसका कारण बताते हुए श्री यादव कहते हैं कि ये पत्रकार जातिभेद से दुष्प्राभावित भारतीय जीवन की वेदना कितनी असह्य है, इसकी कल्पना नहीं कर पाये। सच भी है। इसका जीवंत उदाहरण आरक्षण के समय दिखा। मंडल मुद्दे पर मीडिया का एक पक्ष सामने आया। वह भी आरक्षण के सवाल बंटा दिखा।
दूसरी ओर महादलित आयोग, बिहार के सदस्य और लेखक बबन रावत, मीडिया में दलितों के नहीं होने की सबसे बड़ी वजह देश में व्याप्त जाति व वर्ण व्यवस्था को मानते हैं। रावत कहते हैं कि हमारे यहां की व्यवस्था जाति और वर्ण पर आधारित है जो एक पिरामिड की तरह है, जहां ब्राह्मण सबसे ऊपर और चंडाल सबसे नीचे है और यही मीडिया के साथ भी लागू है। जो भी दलित मीडिया में आते हैं, पहले वे अपनी जात छुपाने की कोशिश करते हैं। लेकिन ज्योंहि उनकी जाति के बारे में पता चलता है, उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार शुरू हो जाता है। वह दलित कितना भी पढ़ा लिखा हो, उसकी मेरिट को नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में दलित पत्रकार हाशिये पर चला जाता है।
वहीं वरिष्ठल पत्रकार अभय कुमार दुबे मीडिया में दलितों की भागीदारी के सवाल पर एक पत्रिका को दिये गये साक्षात्कार में मानते हैं कि पत्रकारिता के लिए लिखाई-पढ़ाई चाहिए और ऐसी लिखाई पढ़ाई चाहिए, जो सरकारी नौकरी के उद्देश्य से प्रेरित न हो। पत्रकारिता तो सोशल इंजीनियरिंग का क्षेत्र है। दलितों में सामाजिक-ऐतिहासिक यथार्थ यह है कि उनमें शिक्षा-दीक्षा का अभाव है। दूसरे, आजकल उनकी शिक्षा-दीक्षा आरक्षण के जरिये सरकारी नौकरी प्राप्त करने की ओर निर्देशित होती है। इससे पत्रकारिता में उनका प्रवेश नहीं हो पाता। दलित और पिछड़े वर्ग के डीएम, एसपी, बीडीओ और थानेदार बनने के लिए अपने समाज को प्रेरित करते हैं, पर पत्रकार बनने के लिए नहीं। जहां तक प्रतिभा का सवाल है, वह सभी में समान होती है और दलित समाज एक के बाद एक प्रतिभा पेश करेगा तो उसे पत्रकार बनने के अवसरों से वंचित रखना असंभव हो जाएगा।
मीडिया पर काबिज सवर्ण व्यवस्था में केवल दलित ही नहीं पिछड़ों के साथ भी दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। चाहे वो कितना भी काबिल या मीडिया का जानकार हो? ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। इन दिनों दिल्ली में एक बडे़ मीडिया हाउस में कार्यरत पिछड़ी जाति के पत्रकार को उस वक्त ताना दिया गया, जब वे पटना में कार्यरत थे। उनके सर नाम के साथ जातिबोध लगा था। मंडल के दौरान उनके सवर्ण कलिगों का व्यवहार एकदम बदल सा गया था, जबकि उस हाउस में गिने-चुने ही पिछड़ी जाति के पत्रकार थे। यही नहीं मीडिया में उस समय कार्यरत पत्रकारों के बारे में जब सवर्ण पत्रकारों को पता चलता, तो वे छींटाकशी से नहीं चूकते थे। यह भेदभाव का रवैया सरकारी मीडिया में दलित-पिछडे पत्रकारों के साथ अप्रत्यक्ष रूप से दिखता है। जातिगत लॉबी यहां भी सक्रिय है लेकिन सरकारी नियमों के तहत प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आता केवल तरीका बदल जाता है और आरक्षण से आये का ताना सुनने को मिलता ही है। सरकारी मीडिया में भले ही दलित-पिछड़े आ गये हों लेकिन वहां भी कमोबेश निजी मीडिया वाली ही स्थिति है। अभी भी सरकारी मीडिया में उच्च पदों पर खासकर फैसले वाले पदों पर दलित-पिछड़ों की संख्या उच्च जाति/वर्ण से बहुत पीछे है।
जो भी हो, समाज में व्याप्त वर्ण/जाति व्यवस्था की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि इसे उखाड़ फेंकने के लिए एक मजबूत आंदोलन की जरूरत है, जिसके लिए मीडिया को आगे आना होगा और जब तक यह नहीं होता दलितों को मीडिया में जगह मिलनी मुश्किल होती रहेगी।